कोरिंगा अभयारण्य में ऑलिव रिडले कछुओं का संरक्षण

कोरिंगा अभयारण्य में ऑलिव रिडले कछुओं का संरक्षण

आंध्र प्रदेश के कोरिंगा वन्यजीव अभयारण्य में अधिकारियों ने होप आइलैंड पर लगभग 20,000 ऑलिव रिडले कछुओं के अंडों का सफल संरक्षण किया है। यह प्रयास समुद्री जैव विविधता के संरक्षण और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के महत्व को दर्शाता है। इस पहल से संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण में चल रहे प्रयासों को नई मजबूती मिली है।

कोरिंगा वन्यजीव अभयारण्य का परिचय

कोरिंगा वन्यजीव अभयारण्य आंध्र प्रदेश में गोदावरी नदी के मुहाने पर स्थित है, जहां कोरिंगा नदी बंगाल की खाड़ी में मिलती है। इसकी स्थापना 1978 में हुई थी और यह भारत के दूसरे सबसे बड़े मैंग्रोव वन क्षेत्र के लिए प्रसिद्ध है। यहां विस्तृत मैंग्रोव जंगलों के साथ-साथ उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन भी पाए जाते हैं, जो इसे एक समृद्ध पारिस्थितिकी क्षेत्र बनाते हैं।

वनस्पति और जीव-जंतु विविधता

इस अभयारण्य में “राइजोफोरा”, “एविसेनिया” और “सोननेराटिया” जैसे प्रमुख मैंग्रोव पौधे पाए जाते हैं। यहां के जीव-जंतुओं में स्मूथ-कोटेड ऊदबिलाव और फिशिंग कैट जैसे संकटग्रस्त स्तनधारी शामिल हैं। इसके अलावा, यह क्षेत्र पक्षियों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जहां ब्लैक-कैप्ड किंगफिशर, ब्राह्मणी चील, सी-गल और सैंडपाइपर जैसे पक्षी बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।

ऑलिव रिडले कछुए और उनका प्रजनन व्यवहार

कोरिंगा का तटीय क्षेत्र ऑलिव रिडले कछुओं के लिए एक महत्वपूर्ण प्रजनन स्थल है। ये कछुए अपने अनोखे सामूहिक अंडे देने के व्यवहार ‘अरिबादा’ के लिए प्रसिद्ध हैं, जिसमें हजारों मादा कछुए एक साथ तट पर आकर अंडे देती हैं। यह प्रजाति प्रशांत, अटलांटिक और हिंद महासागर के गर्म जल क्षेत्रों में पाई जाती है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • कोरिंगा वन्यजीव अभयारण्य आंध्र प्रदेश में गोदावरी डेल्टा क्षेत्र में स्थित है।
  • यहां भारत का दूसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव वन पाया जाता है।
  • ऑलिव रिडले कछुए ‘अरिबादा’ नामक सामूहिक अंडे देने की प्रक्रिया के लिए जाने जाते हैं।
  • इस प्रजाति का IUCN दर्जा “संवेदनशील” (Vulnerable) है और यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में शामिल है।

संरक्षण का महत्व

ऑलिव रिडले कछुओं के अंडों का संरक्षण यह दर्शाता है कि तटीय पारिस्थितिकी तंत्र को बचाना कितना जरूरी है। मैंग्रोव वन न केवल जैव विविधता को सहारा देते हैं, बल्कि तटीय कटाव और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से भी सुरक्षा प्रदान करते हैं। ऐसे संरक्षण प्रयास पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और संकटग्रस्त प्रजातियों के अस्तित्व को सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

अंततः, कोरिंगा में किया गया यह संरक्षण कार्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

Originally written on March 30, 2026 and last modified on March 30, 2026.

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