कोयंबटूर के कुमिट्टिपाठी में 2,300 वर्ष पुराने शैलचित्र संरक्षण के अभाव में संकटग्रस्त
तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के कुमिट्टिपाठी गांव में स्थित लगभग 2,300 वर्ष पुराने प्राचीन शैलचित्र संरक्षण के अभाव में क्षति और उपेक्षा का सामना कर रहे हैं। राज्य सरकार ने पिछले वर्ष इन्हें संरक्षित स्मारक घोषित किया था, फिर भी स्थल पर बुनियादी सुरक्षा उपाय लागू नहीं किए गए हैं। केरल सीमा के निकट पाथिमलाई पहाड़ी पर, मदुक्करई के पास तिरुमलायमपलायम टाउन पंचायत क्षेत्र में स्थित इन गुफाओं में सफेद रंगद्रव्य से चित्रांकन किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये चित्र प्रारंभिक मानव बसावट के संकेत देते हैं और संभवतः यह क्षेत्र कभी हाथियों का प्राकृतिक आवास रहा होगा।
विशिष्ट प्रागैतिहासिक शैलकला की झलक
निचली गुफा में हाथी और रथ के चित्र अंकित हैं, जबकि ऊपरी गुफा में मानव-सदृश आकृतियां दिखाई देती हैं। लगभग चार फीट चौड़ाई और दो फीट ऊंचाई वाले ये चित्र तमिलनाडु की प्रागैतिहासिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की दुर्लभ झलक प्रस्तुत करते हैं।
भारत में शैलकला की परंपरा मध्यपाषाण काल से लेकर प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तक फैली हुई है। कुमिट्टिपाठी की विशेषता यह है कि यह स्थल घने जंगलों के भीतर छिपा नहीं है, बल्कि अपेक्षाकृत सुलभ स्थान पर स्थित है। यही सुलभता इसे तोड़फोड़ और मानवीय हस्तक्षेप के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है।
संरक्षित घोषित, फिर भी असुरक्षित
वर्ष 2025 में तमिलनाडु सरकार ने इसे तमिलनाडु प्राचीन एवं ऐतिहासिक स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1966 की धारा 3(1) के अंतर्गत संरक्षित स्मारक घोषित किया। अधिकारियों ने स्थल की घेराबंदी करने और ऐतिहासिक महत्व बताने वाला सूचना पट्ट लगाने की योजना की घोषणा की थी।
हालांकि, अब तक न तो बाड़बंदी की गई है और न ही कोई सूचना बोर्ड लगाया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अधिसूचना के बावजूद जमीनी स्तर पर संरक्षण कार्यों की गति धीमी है।
वैंडलिज्म और पर्यावरणीय क्षति
स्थल पर रसोई बनाने और सामूहिक गतिविधियों के कारण धुएं से गुफा की दीवारों को नुकसान पहुंचा है। दीवारों पर लिखावट और चित्रों के पास पत्थरों की अनियंत्रित व्यवस्था जैसी गतिविधियों ने भी मूल कला को क्षति पहुंचाई है। हाल ही में ध्यान स्थल के रूप में पत्थरों की संरचना बनाई गई थी, जिसे बाद में अधिकारियों ने हटाया।
स्थानीय युवाओं की निरंतर आवाजाही से भी चित्रों की नाजुक सतह खतरे में है। संरक्षण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह अमूल्य विरासत स्थायी रूप से नष्ट हो सकती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
* भारत में शैलचित्रों का इतिहास मध्यपाषाण और प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तक जाता है।
* तमिलनाडु के पश्चिमी घाट क्षेत्र में कई प्रागैतिहासिक गुफा कला स्थल स्थित हैं।
* तमिलनाडु प्राचीन एवं ऐतिहासिक स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1966 अधिसूचित विरासत स्थलों को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है।
* प्राचीन शैलचित्रों में प्रयुक्त सफेद रंगद्रव्य अक्सर चूना या काओलिन से तैयार किया जाता था।
कुमिट्टिपाठी का यह स्थल सुलभ विरासत स्थलों की सुरक्षा से जुड़ी व्यापक चुनौती को उजागर करता है। पुरातत्व विभाग ने घेराबंदी, सुरक्षा कर्मियों की तैनाती और सूचना पट्ट लगाने की योजना दोहराई है। समय पर और प्रभावी संरक्षण उपाय ही इन अमूल्य शैलचित्रों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख सकते हैं।