केरल में खोजी गई नई ड्रैगनफ्लाई प्रजाति: Lyriothemis keralensis बनी भारत की कीट विविधता में नई उपलब्धि

केरल में खोजी गई नई ड्रैगनफ्लाई प्रजाति: Lyriothemis keralensis बनी भारत की कीट विविधता में नई उपलब्धि

भारत में कीट जैव विविधता के अध्ययन में एक उल्लेखनीय उपलब्धि सामने आई है। केरल के तटीय क्षेत्रों से एक नई ड्रैगनफ्लाई प्रजाति की खोज की गई है, जिसे Lyriothemis keralensis नाम दिया गया है। आम भाषा में इसे “स्लेंडर बॉम्बार्डियर” कहा जा रहा है। यह खोज एक दशक से अधिक समय तक चले गहन क्षेत्रीय अध्ययन और टैक्सोनॉमिक विश्लेषण के बाद पुष्टि की गई है।

दस वर्षों के शोध के बाद मिली औपचारिक पहचान

इस प्रजाति की पहचान डॉ. दत्तप्रसाद सावंत, डॉ. ए विवेक चंद्रन, रेंजिथ जैकब मैथ्यूज़ और डॉ. कृशनामेघ कुंटे के नेतृत्व में की गई। इस टीम का अध्ययन International Journal of Odonatology में प्रकाशित हुआ है। सबसे पहले 2013 में इसे केरल के कोठमंगलम स्थित वरापेट्टी क्षेत्र में देखा गया था, और उस समय इसे Lyriothemis acigastra (Little Bloodtail) समझा गया, जो मुख्यतः पूर्वोत्तर भारत में पाई जाती है।

गलत पहचान से अलग प्रजाति की पुष्टि

बाद में किए गए आकारिकी (morphological) और व्यवहारिक विश्लेषण से स्पष्ट हुआ कि केरल की यह ड्रैगनफ्लाई कई विशेषताओं में acigastra से भिन्न है। शताब्दी पुराने संग्रहालय नमूनों से तुलना करके यह निष्कर्ष और भी सशक्त हुआ कि यह वास्तव में एक नई, स्वतंत्र प्रजाति है।

शारीरिक बनावट और व्यवहार में विशेष अंतर

Lyriothemis keralensis की पहचान निम्नलिखित विशिष्ट विशेषताओं से की जा सकती है:

  • अधिक पतला उदर (abdomen)
  • विशिष्ट पूंछ संरचना
  • नर जननांगों की अलग बनावट

वयस्क नर गहरे रक्त-लाल रंग के उदर पर काले चिह्नों के साथ दिखते हैं, जबकि मादाएं थोड़ी मोटी होती हैं और पीले-काले रंग संयोजन में होती हैं। यह ड्रैगनफ्लाई करीब 3 सेंटीमीटर लंबी होती है और मुख्यतः मानसून के दौरान सक्रिय रहती है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • Lyriothemis keralensis एक ड्रैगनफ्लाई प्रजाति है जो केवल केरल में पाई जाती है (एंडेमिक)।
  • यह Odonata गण और Libellulidae कुल (family) से संबंधित है।
  • इसे पहले गलती से Lyriothemis acigastra समझा गया था।
  • इसका औपचारिक विवरण International Journal of Odonatology में प्रकाशित हुआ है।

असामान्य आवास और संरक्षण की आवश्यकता

यह प्रजाति अन्य ओडोनेट प्रजातियों की तरह वनों या संरक्षित क्षेत्रों में नहीं, बल्कि मानव-परिवर्तित परिदृश्यों में पाई जाती है। शोधकर्ताओं ने इसे छायादार सिंचाई नहरों और मौसमी तालाबों में देखा, जो अनानास और रबर के बागानों के भीतर स्थित थे।

डॉ. विवेक चंद्रन ने ज़ोर दिया कि संरक्षण योजनाओं को केवल वनों तक सीमित न रखते हुए कृषि क्षेत्रों में मौजूद नाजुक माइक्रो-हैबिटैट्स को भी शामिल करना चाहिए। इस प्रजाति का भविष्य अब बहुत हद तक स्थानीय भूमि उपयोग की जिम्मेदारी और पारिस्थितिकी सुरक्षा पर निर्भर करता है।

Lyriothemis keralensis की खोज न केवल कीट विज्ञान में एक अहम योगदान है, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि जैव विविधता की रक्षा केवल संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह सकती—बल्कि हमें हर उस छोटे पारिस्थितिक तंत्र पर ध्यान देना होगा, जहां जीवन फल-फूल रहा है।

Originally written on February 11, 2026 and last modified on February 11, 2026.

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