केन टोड: पारिस्थितिक असंतुलन का वैश्विक प्रतीक
दक्षिण और मध्य अमेरिका में पाई जाने वाली केन टोड (Cane Toad) अब दुनिया भर में पारिस्थितिक असंतुलन का प्रतीक बन चुकी है। मूल रूप से इसे कृषि कीट नियंत्रण के लिए विभिन्न देशों में लाया गया था, लेकिन यह प्रयोग उल्टा पड़ गया। कीटों को नियंत्रित करने के बजाय इस प्रजाति ने स्वयं ही अनेक पारिस्थितिक तंत्रों को नुकसान पहुँचाया, जिससे यह विदेशी प्रजाति स्थानांतरण के खतरों का एक प्रमुख उदाहरण बन गई।
उत्पत्ति और वैश्विक प्रसार
केन टोड को 20वीं सदी के आरंभ में कई देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया, कैरिबियाई द्वीप और प्रशांत द्वीपों में गन्ने की फसलों को नष्ट करने वाले भृंगों (बीटल्स) को नियंत्रित करने के लिए लाया गया था। लेकिन परिणाम उम्मीद के विपरीत रहे। यह प्रजाति तेजी से बढ़ी, स्थानीय पर्यावरण में ढल गई और देशी जीवों को प्रतिस्पर्धा में हरा दिया। इसकी सुदृढ़ जैविक संरचना और विभिन्न जलवायु परिस्थितियों के प्रति सहनशीलता ने इसे अनेक प्रकार के पर्यावासों में स्थापित होने में मदद की।
भौतिक विशेषताएँ और विषैली रक्षा प्रणाली
वयस्क केन टोड सामान्यतः 10 से 20 सेंटीमीटर लंबा होता है, किंतु कुछ इससे भी बड़े आकार तक पहुँच जाते हैं। इनकी त्वचा मोटी और मस्सेदार होती है, तथा आँखों के पीछे प्रमुख पारोटॉइड ग्रंथियाँ (parotoid glands) स्थित होती हैं। ये ग्रंथियाँ “बुफोटॉक्सिन” (bufotoxin) नामक शक्तिशाली विष निकालती हैं, जो ऐसे शिकारी जीवों को मार सकता है जिनमें इसके प्रति कोई प्राकृतिक प्रतिरोध नहीं होता। इनके बच्चे, भले ही कम विषैले हों, परंतु तेजी से जीवित रहते और बढ़ते हैं, जिससे जनसंख्या नियंत्रण लगभग असंभव हो जाता है।
अनुकूलन क्षमता और विस्तार की सफलता
केन टोड अपनी असाधारण शारीरिक लचीलापन (physiological flexibility) के कारण अत्यधिक परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है। यह गर्मी, ठंड और जल की कमी को सहन कर लेता है और नई जगहों पर तुरंत अनुकूल हो जाता है। वैज्ञानिक शोधों में पाया गया है कि नई आबादी वाले क्षेत्रों में इनके पैर लंबे और सहनशक्ति अधिक होती है, जिससे ये तेजी से फैलते हैं। इनका शहरी और विकृत पर्यावरणों में जीवित रहना इस प्रजाति को दुनिया के सबसे सफल आक्रामक जीवों में शामिल करता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- केन टोड को मूल रूप से कृषि कीट नियंत्रण के लिए लाया गया था, लेकिन यह आक्रामक प्रजाति बन गया।
- इनकी पारोटॉइड ग्रंथियाँ “बुफोटॉक्सिन” नामक घातक विष उत्पन्न करती हैं।
- यह गर्मी, ठंड और निर्जलीकरण जैसी परिस्थितियों में आसानी से जीवित रह सकता है।
- यह खेतों, दलदलों, बागानों और शहरी क्षेत्रों तक फैल चुका है।
पारिस्थितिक प्रभाव और वैश्विक खतरा
केन टोड की उपस्थिति ने कई महाद्वीपों की पारिस्थितिकी को गहराई से प्रभावित किया है। यह कीट, छोटे कशेरुकी जीवों और मृत जैव पदार्थों को खाता है, जिससे खाद्य शृंखलाएँ बाधित हो जाती हैं और देशी प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। विशेषकर ऑस्ट्रेलिया में इसके विष के कारण कई शिकारी प्रजातियों की संख्या घट गई है। इसकी तेज प्रजनन दर और व्यापक पर्यावरणीय सहनशीलता इसे नियंत्रित करना कठिन बनाती है। आज केन टोड वैश्विक जैव विविधता के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है, जो यह याद दिलाता है कि मानव द्वारा किसी भी प्रजाति का अनियंत्रित स्थानांतरण कितने दूरगामी परिणाम ला सकता है।