कसावा ब्राउन स्ट्रीक रोग से अफ्रीका में खाद्य सुरक्षा पर खतरा
उप-सहारा अफ्रीका में कसावा फसल पर फैल रही एक वायरल बीमारी ने किसानों और वैज्ञानिकों के बीच चिंता बढ़ा दी है। यह बीमारी कसावा की जड़ों को सड़ाकर फसल को गंभीर नुकसान पहुंचाती है। कसावा सूखा और खराब मिट्टी में भी उगने वाली एक महत्वपूर्ण खाद्य फसल है, जिस पर लाखों लोगों की खाद्य सुरक्षा और आय निर्भर करती है। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि कसावा ब्राउन स्ट्रीक रोग (CBSD) के बढ़ते प्रसार से इस फसल की स्थिरता और क्षेत्रीय खाद्य व्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है।
कसावा ब्राउन स्ट्रीक रोग का प्रभाव
कसावा ब्राउन स्ट्रीक रोग जड़ों में नेक्रोसिस यानी ऊतक क्षति पैदा करता है, जिससे फसल पूरी तरह नष्ट हो सकती है। इस बीमारी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके लक्षण अक्सर फसल की कटाई तक स्पष्ट नहीं होते। जब किसान जड़ों को निकालते हैं तब उन्हें पता चलता है कि जड़ें भूरे रंग की और खाने योग्य नहीं रह गई हैं। इससे किसानों को आर्थिक नुकसान होता है और खाद्य संकट की स्थिति भी पैदा हो सकती है।
यह रोग पहले लगभग 70 वर्षों तक मुख्य रूप से तंजानिया और मोजाम्बिक के तटीय क्षेत्रों तक सीमित था। लेकिन बाद में यह युगांडा सहित पूर्वी और मध्य अफ्रीका के कई हिस्सों में फैल गया। अब वैज्ञानिकों को आशंका है कि यदि प्रभावी रोकथाम उपाय नहीं किए गए तो पश्चिमी अफ्रीका के प्रमुख कसावा उत्पादक देश—जैसे नाइजीरिया और घाना—भी इस रोग के खतरे में आ सकते हैं।
अफ्रीका में संभावित जोखिम का विस्तार
‘ईस्ट अफ्रीकन जर्नल ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार अफ्रीका के लगभग 54.6 प्रतिशत भूभाग, यानी करीब 16.2 मिलियन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र, कसावा की खेती के लिए उपयुक्त है। वहीं लगभग 33.7 प्रतिशत क्षेत्र, यानी करीब 10.2 मिलियन वर्ग किलोमीटर, इस बीमारी के फैलने के जोखिम में है।
वैज्ञानिकों के अनुसार पर्यावरणीय परिस्थितियां, मेजबान पौधों की उपलब्धता और संक्रमित रोपण सामग्री का अनौपचारिक व्यापार इस बीमारी के प्रसार के प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान और बदलते वर्षा पैटर्न भी कुछ क्षेत्रों में इस बीमारी के खतरे को बढ़ा सकते हैं।
व्हाइटफ्लाई की भूमिका और कृषि पद्धतियां
कसावा ब्राउन स्ट्रीक रोग मुख्य रूप से ‘बेमिसिया तबाची’ नामक व्हाइटफ्लाई द्वारा फैलता है। विशेष रूप से इसके उप-सहारा अफ्रीका 1 और 2 आनुवंशिक समूह पूर्वी और मध्य अफ्रीका में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। कृषि की तीव्रता और जलवायु परिवर्तन ने इन कीटों की संख्या को और बढ़ा दिया है।
छोटे किसानों की खेती पद्धतियां भी रोग के प्रसार में योगदान देती हैं। कई किसान पिछले मौसम की फसल से कटिंग लेकर नई फसल लगाते हैं, जिससे अनजाने में संक्रमित पौधे फिर से खेत में लग जाते हैं। अफ्रीका के कई हिस्सों में औपचारिक बीज प्रणाली कमजोर है, जबकि थाईलैंड जैसे देशों में प्रमाणित रोग-मुक्त रोपण सामग्री का उपयोग सामान्य है। इसके अलावा कुछ उच्च उत्पादक किस्में, जिन्हें कसावा मोजेक रोग से बचाने के लिए विकसित किया गया था, वे CBSD के प्रति संवेदनशील पाई गईं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- कसावा ब्राउन स्ट्रीक रोग एक वायरल रोग है जो कसावा की जड़ों में नेक्रोसिस पैदा करता है और भारी उत्पादन हानि का कारण बनता है।
- बेमिसिया तबाची नामक व्हाइटफ्लाई इस रोग का मुख्य वाहक है।
- कसावा उप-सहारा अफ्रीका में एक महत्वपूर्ण खाद्य फसल है जो सूखा और कम उर्वर मिट्टी में भी उग सकती है।
- जलवायु परिवर्तन कीटों की आबादी और फसल रोगों के प्रसार को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि वैज्ञानिकों ने दक्षिण अमेरिका की कुछ कसावा किस्मों में इस रोग के प्रति प्राकृतिक प्रतिरोध पाया है। इन किस्मों के जर्मप्लाज्म को अफ्रीकी देशों—जैसे कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, तंजानिया, युगांडा और मोजाम्बिक—में चल रहे प्रजनन कार्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है। ऐसे दोहरे प्रतिरोध वाली नई किस्मों पर भी काम हो रहा है जो CBSD और अन्य वायरल रोगों दोनों से सुरक्षा प्रदान कर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि रोग-मुक्त बीज प्रणाली और क्षेत्रीय निगरानी को मजबूत करना अफ्रीका की कसावा अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए बेहद जरूरी है।