कश्मीर में साही बना केसर खेती के लिए नई चुनौती
कश्मीर में केसर की खेती पर हाल ही में एक नया खतरा सामने आया है, जहां Indian crested porcupine द्वारा केसर के कंद (corms) को जमीन के भीतर से खाया जा रहा है। यह प्रजाति कंदों को फूल बनने से पहले ही खोखला कर देती है, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। केसर कश्मीर की अर्थव्यवस्था और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा है, ऐसे में यह समस्या चिंता का विषय बन गई है।
भारतीय साही का परिचय
भारतीय साही एक बड़ा कृंतक (rodent) है, जो “Hystricidae” परिवार से संबंधित है। यह एशिया के सबसे बड़े कृंतकों में से एक है और अपने शरीर पर मौजूद तेज, नुकीले कांटों (quills) के लिए जाना जाता है। यह प्रजाति भारत सहित दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और मध्य पूर्व के कई देशों में पाई जाती है।
आवास और वितरण
यह प्रजाति मुख्यतः चट्टानी पहाड़ियों में निवास करती है, लेकिन यह घास के मैदानों, झाड़ियों और जंगलों में भी आसानी से पाई जाती है। भारत में यह हिमालयी क्षेत्रों सहित विभिन्न भौगोलिक स्थानों पर 2400 मीटर की ऊंचाई तक देखी जा सकती है। इसकी अनुकूलन क्षमता इसे विभिन्न पर्यावरणों में जीवित रहने में सक्षम बनाती है।
प्रमुख विशेषताएं और व्यवहार
भारतीय साही का जीवनकाल लगभग 18 से 20 वर्ष होता है। इसके शरीर पर मौजूद कांटे इसकी रक्षा का मुख्य साधन हैं। यह कांटे फेंक नहीं सकता, बल्कि खतरे की स्थिति में पीछे की ओर हमला करता है। यह एक निशाचर (nocturnal) जीव है, जो दिन में गुफाओं, चट्टानों की दरारों या बिलों में छिपा रहता है। इसके मजबूत पैर और लंबे नाखून इसे खुदाई और बिल बनाने में मदद करते हैं।
केसर खेती पर प्रभाव
भारतीय साही मुख्यतः शाकाहारी होता है और फल, अनाज तथा जड़ों पर निर्भर करता है। लेकिन कश्मीर में इसका केसर के कंदों को खाने का व्यवहार किसानों के लिए नई समस्या बन गया है। यह जमीन के अंदर घुसकर कंदों को नुकसान पहुंचाता है, जिससे फसल अंकुरित होने से पहले ही नष्ट हो जाती है। इससे उत्पादन में गिरावट और आर्थिक नुकसान बढ़ रहा है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारतीय साही “Hystricidae” परिवार से संबंधित है।
- यह एक निशाचर और मुख्यतः शाकाहारी जीव है।
- यह अपने कांटों से रक्षा करता है, लेकिन उन्हें फेंक नहीं सकता।
- IUCN रेड लिस्ट में इसकी स्थिति “Least Concern” है।
कश्मीर में केसर की खेती पर इस नए खतरे ने कृषि और वन्यजीव प्रबंधन के बीच संतुलन की आवश्यकता को उजागर किया है। भविष्य में इस समस्या से निपटने के लिए प्रभावी रणनीतियों और वैज्ञानिक उपायों की जरूरत होगी, ताकि किसानों की आजीविका सुरक्षित रह सके।