कश्मीर घाटी में यूरेशियन ऊदबिलाव की वापसी: हिमालयी पारिस्थितिकी का पुनर्जीवन
कभी विलुप्त माने जाने वाला यूरेशियन ऊदबिलाव (Eurasian Otter) अब चुपचाप कश्मीर घाटी में अपने ऐतिहासिक आवास क्षेत्रों में लौट रहा है। यह प्रजाति पश्चिमी हिमालय की उन नदियों के सहारे फिर से उभर रही है जो लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) को पार करती हैं। दशकों बाद इस दुर्लभ प्राणी की वापसी, क्षेत्रीय पारिस्थितिकी में एक आशाजनक पुनरुद्धार का संकेत देती है।
पांच दशकों में पहली बार प्रत्यक्ष प्रमाण
कश्मीर के गांदरबल जिले के सिंध नाला में वन विभाग ने ऊदबिलाव की लगभग 50 वर्षों में पहली बार प्रत्यक्ष फोटोग्राफिक प्रमाण दर्ज किया है। गुटलीबाग क्षेत्र में रेंज अधिकारी फैज़ान अनवर मीर ने दिन के समय एक उप-वयस्क ऊदबिलाव को देखा और उसका चित्र लिया।
यह बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यूरेशियन ऊदबिलाव आमतौर पर निशाचर और अत्यंत गुप्त प्रवृत्ति का प्राणी होता है, जिससे दृश्य प्रमाण मिलना दुर्लभ होता है।
किशनगंगा नदी: एक पारसीमांत प्रवास गलियारा
गुरेज़ घाटी से प्राप्त प्रमाण बताते हैं कि किशनगंगा नदी यूरेशियन ऊदबिलाव के लिए एक प्राकृतिक प्रवास मार्ग का कार्य कर रही है। तराबल के पास बार-बार देखे जाने से पता चलता है कि ये जीव पाक अधिकृत कश्मीर और उत्तर कश्मीर के गाँवों के बीच स्वतंत्र रूप से आवाजाही कर रहे हैं, विशेष रूप से केरन और तीतवाल क्षेत्रों में LoC पार करते हुए।
इसका संकेत है कि ऊदबिलाव ठंडी, तेज बहाव वाली पहाड़ी नदियों का उपयोग कर सीमा पार आ-जा रहे हैं, जो औद्योगिक प्रदूषण से काफी हद तक अछूती हैं।
ऊँचाई वाले जल स्रोत: सुरक्षित पारिस्थितिक शरणस्थल
शोधकर्ताओं का कहना है कि LoC के पास की नदियाँ, भले ही भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील हों, परंतु पारिस्थितिकी की दृष्टि से वे अप्रत्याशित सुरक्षित आश्रय बन गई हैं।
यहाँ न्यूनतम नागरिक बुनियादी ढाँचा, कम प्रदूषण और स्वस्थ मछली जनसंख्या ने ऐसी स्थितियाँ पैदा की हैं जो ऊदबिलाव जैसे जलजीवों के लिए आदर्श हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- यूरेशियन ऊदबिलाव एक अर्ध-जलचर स्तनधारी है जो स्वच्छ ताजे जल पर निर्भर करता है।
- किशनगंगा नदी जम्मू-कश्मीर में बहने वाली एक पारसीमांत नदी है।
- ऊदबिलाव नदी पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के संकेतक माने जाते हैं।
- ठंडी, ऊँचाई वाली धाराएँ जैव विविधता के लिए उपयुक्त होती हैं क्योंकि वहाँ प्रदूषण स्तर बेहद कम होता है।
पारिस्थितिक महत्त्व और संरक्षण की आवश्यकता
वन्यजीव विशेषज्ञ अब यह अध्ययन कर रहे हैं कि क्या यह लौटती जनसंख्या पाक अधिकृत कश्मीर या लद्दाख से होकर केंद्रीय कश्मीर की ओर बढ़ रही है। सिंध नाला और किशनगंगा के किनारे ऊदबिलाव की उपस्थिति, प्रजाति की सहनशीलता के साथ-साथ इस तथ्य को भी उजागर करती है कि इनका अस्तित्व स्वच्छ जल और स्थिर मछली संसाधनों पर निर्भर है।
संरक्षण के दृष्टिकोण से यह वापसी एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि इस दुर्लभ हिमालयी निवासी की दीर्घकालिक उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए निरंतर पारिस्थितिक संरक्षण अनिवार्य होगा।