कर्नाटक हाई कोर्ट का कप्पतागुड्डा वन्यजीव अभयारण्य की सीमा बढ़ाने का निर्देश
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि गडग जिले में स्थित कप्पतागुड्डा आरक्षित वन के शेष हिस्सों को कप्पतागुड्डा वन्यजीव अभयारण्य की सीमा में शामिल किया जाए। अदालत ने पाया कि मई 2019 में जारी सरकारी अधिसूचना में केवल 244.15 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ही अभयारण्य घोषित किया गया था, जबकि कर्नाटक राज्य वन्यजीव बोर्ड ने इससे पहले इससे अधिक क्षेत्र को संरक्षण देने की सिफारिश की थी। यह आदेश राज्य में वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
अभयारण्य क्षेत्र में अंतर पर अदालत की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति सी.एम. पूनाचा की खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि कर्नाटक राज्य वन्यजीव बोर्ड ने 9 जनवरी 2019 की बैठक में सर्वसम्मति से पूरे कप्पतागुड्डा आरक्षित वन क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने का प्रस्ताव पारित किया था। उस समय लगभग 300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को संरक्षण देने पर विचार किया गया था।
हालांकि 16 मई 2019 को जारी सरकारी अधिसूचना में केवल 244.15 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ही अभयारण्य घोषित किया गया, जिससे आरक्षित वन का बड़ा हिस्सा संरक्षण से बाहर रह गया। अदालत ने इसे वन्यजीव बोर्ड के निर्णय के विपरीत और असंगत माना।
स्टोन क्रशिंग इकाइयों की याचिकाएँ खारिज
यह निर्देश अदालत ने शिवगंगा स्टोन क्रशिंग इंडस्ट्रीज और अन्य संचालकों द्वारा दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए दिया। ये कंपनियाँ कप्पतागुड्डा आरक्षित वन के चौथे ब्लॉक के पास स्थित निजी भूमि पर पत्थर क्रशिंग इकाइयाँ संचालित कर रही थीं।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि अभयारण्य घोषित होने के कारण उनकी भूमि अभयारण्य के आसपास के पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र में आ जाती है, जिससे उनकी औद्योगिक गतिविधियाँ प्रभावित हो रही हैं। उन्होंने अदालत से अभयारण्य की सीमा को 2017 में प्रस्तावित 178 वर्ग किलोमीटर तक सीमित करने की मांग की थी। लेकिन अदालत ने उनकी दलीलों को अस्वीकार कर दिया।
सरकार को नई अधिसूचना जारी करने का निर्देश
सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार से पूछा कि अभयारण्य के क्षेत्र को कम क्यों किया गया। सरकार के वकील ने बताया कि क्षेत्र घटाने के संबंध में कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पहले बताए गए 300 वर्ग किलोमीटर के अनुमान के बजाय वास्तविक आरक्षित वन क्षेत्र लगभग 288 वर्ग किलोमीटर है।
अदालत ने माना कि अभयारण्य के क्षेत्र को कम करना मनमाना था और यह मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाले राज्य वन्यजीव बोर्ड के निर्णय के अनुरूप नहीं था। इसलिए अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि लगभग 55 वर्ग किलोमीटर के शेष क्षेत्र को शामिल करते हुए नई अधिसूचना जारी की जाए।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारत में वन्यजीव अभयारण्य की घोषणा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत की जाती है।
- राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड देश में वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी सर्वोच्च सलाहकारी संस्था है।
- पारिस्थितिक संवेदनशील क्षेत्र संरक्षित क्षेत्रों के आसपास के बफर जोन होते हैं, जहां कुछ गतिविधियों को नियंत्रित किया जाता है।
- कर्नाटक में पश्चिमी घाट और दक्कन पठार क्षेत्र में जैव विविधता संरक्षण के लिए कई संरक्षित क्षेत्र स्थापित किए गए हैं।
कर्नाटक उच्च न्यायालय का यह फैसला वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरणीय शासन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि संरक्षण से संबंधित निर्णय कानूनी प्रक्रियाओं और विशेषज्ञ संस्थाओं की सिफारिशों के अनुरूप लागू किए जाएँ। साथ ही यह निर्णय प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और सतत विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में भी अहम भूमिका निभाता है।