कर्नाटक में पहली बार “सैंडलवुड लेपर्ड” का दुर्लभ रंग रूप दर्ज

कर्नाटक में पहली बार “सैंडलवुड लेपर्ड” का दुर्लभ रंग रूप दर्ज

भारत में अब तक बहुत ही कम प्रमाणित दुर्लभ रंग रूप वाले तेंदुए पाए गए हैं और हाल ही में कर्नाटक के विजयनगर जिले से एक अनूठा और बेहद दुर्लभ प्रजातीय दृष्टि मिला है जिसे अनौपचारिक रूप से “सैंडलवुड लेपर्ड” कहा जा रहा है। यह राज्य के वन्यजीव विविधता में जेनेटिक विविधता का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है और इसे पहली बार कर्नाटक में देखा गया है तथा पूरे भारत में यह दूसरी पुष्टि की गई सूचना है।

कर्नाटक के कागजातों में दर्ज यह दुर्लभ रंग रूप का तेंदुआ सामान्य तांबे रंग की त्वचा और काले रोसेट वाले तेंदुओं से बिल्कुल भिन्न है। इसका कोट हल्का लाल-गुलाबी रंग का है जिसमें हल्के भूरे रोसेट दिखाई देते हैं। यह अत्यंत ही अनोखा रूप है जिसे देखने पर वैज्ञानिक और वन्यजीव प्रेमी दोनों ही आकर्षित हुए हैं। इस लेख में हम इस दुर्लभ तेंदुए की खोज, इसके वैज्ञानिक मायने, संभावित कारण और इसके संरक्षण महत्व को विस्तार से समझेंगे।

दुर्लभ रंग रूप की खोज

इस दुर्लभ तेंदुए की खोज विजयनगर जिले में हुई, जहां वन्यजीव जैव वैज्ञानिक डॉ. संजय गुब्बी और उनकी टीम ने इसे कैमरा ट्रैप के माध्यम से रिकॉर्ड किया। टीम Holematthi Nature Foundation से जुड़ी है और वे कर्नाटक के कालेयाना क्षेत्र में तेंदुओं की विविधता और वितरण पर विस्तृत अध्ययन कर रहे हैं। इन कैमरा ट्रैप छवियों में इस वयस्क मादा तेंदुए को देखा गया, जो लगभग छह से सात वर्ष की उम्र की प्रतीत होती है। इसके अलावा कुछ तस्वीरों में यह तेंदुआ अपने एक बच्चे के साथ भी देखी गई, जिसका रंग सामान्य तेंदुओं जैसा तांबे रंग का था। यह अंतर इस रंग रूप की दुर्लभता को और स्पष्ट करता है।

वैज्ञानिक कारण और संभावनाएँ

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस रंग रूप के पीछे जेनेटिक कारण हो सकते हैं। दो संभावित स्थितियाँ जिन पर विशेषज्ञों ने ध्यान दिया है, वे हैं हाइपोमेलानिज़्म और एरिथ्रिज़्म

  • हाइपोमेलानिज़्म में कोट में मेलानिन का कम होना शामिल है जिससे सामान्य रंग अपेक्षाकृत हल्का दिखता है।
  • एरिथ्रिज़्म में लाल पिगमेंट का अधिक होना होता है, जिससे जानवरों का रंग गुलाबी-भूरा दिखाई दे सकता है।

इन कारणों की पुष्टि के लिए आणविक विश्लेषण (जैसे कि बाल, मिट्टी या scat के नमूनों से DNA जांच) की आवश्यकता होगी, क्योंकि बिना DNA विश्लेषण के सटीक जेनेटिक कारण ज्ञात करना कठिन है।

कर्नाटक की जैविक विविधता

कर्नाटक देश के उन क्षेत्रों में शामिल है जहां तेंदुओं की अधिक संख्या पाई जाती है। अनुमान है कि कर्नाटक में लगभग 2,500 तेंदुए हैं, जो इसे भारत में बड़े बिल्लियों के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बनाते हैं। साथ ही, यह राज्य मेलनिस्टिक तेंदुओं (काले पैंथर के रूप में जाने जाने वाले) के लिए भी प्रसिद्ध है, जो कि इसी क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक पाए जाते हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • सैंडलवुड लेपर्ड भारत में अब तक दूसरी बार रिपोर्ट किया गया दुर्लभ रंग रूप है।
  • यह रंग रूप सामान्य तेंदुए के तांबे रंग की बजाय हल्का लाल-गुलाबी रंग का होता है।
  • संभावित कारणों में हाइपोमेलानिज़्म और एरिथ्रिज़्म शामिल हैं, जिनसे पिगमेंटेशन प्रभावित होता है।
  • कर्नाटक तेंदुओं की घनी आबादी और जैविक विविधता के लिए राष्ट्रीय और वैश्विक रूप से महत्वपूर्ण है।

वैश्विक दुर्लभता और संरक्षण महत्व

वैश्विक स्तर पर इस प्रकार के रंग रूप के तेंदुए बहुत ही कम दर्ज किए गए हैं। अफ्रीका के कुछ भागों जैसे दक्षिण अफ्रीका और तंज़ानिया में भी कुछ रिकॉर्ड मिले हैं, लेकिन कुल मिलाकर यह अत्यंत दुर्लभ ही हैं। इस दुर्लभ रंग रूप की उपस्थिति न केवल जैविक विविधता की गवाही देती है, बल्कि यह संकेत भी देती है कि लंबे समय तक और सतत निगरानी तथा संरक्षण प्रयासों की जरूरत है ताकि इस प्रकार के अनूठे जीवों के बारे में और अधिक जानकारी जुटाई जा सके।

यह खोज न सिर्फ कर्नाटक बल्कि पूरे देश के वन्यजीव संरक्षण के दृष्टिकोण को और मजबूत करती है तथा यह याद दिलाती है कि पृथ्वी पर हर प्रजाति और रूप का अपना महत्व है, जिसे संरक्षित रखना हमारा दायित्व है।

Originally written on January 3, 2026 and last modified on January 3, 2026.

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