कर्नाटक घृणा भाषण एवं अपराध निवारण विधेयक 2025 राष्ट्रपति की अनुमति हेतु सुरक्षित, राज्यपाल ने उठाए संवैधानिक प्रश्न

कर्नाटक घृणा भाषण एवं अपराध निवारण विधेयक 2025 राष्ट्रपति की अनुमति हेतु सुरक्षित, राज्यपाल ने उठाए संवैधानिक प्रश्न

कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने कर्नाटक घृणा भाषण और घृणा अपराध (निवारण) विधेयक, 2025 को राष्ट्रपति की अनुमति के लिए सुरक्षित कर दिया है। यह निर्णय विधेयक के संवैधानिक, कानूनी और प्रक्रियात्मक पहलुओं पर गंभीर आपत्तियों के चलते लिया गया है। यह विधेयक दिसंबर 2025 में बेलगावी में आयोजित राज्य विधानसभा के शीतकालीन सत्र में पारित किया गया था।

संवैधानिक शक्तियों का उपयोग: अनुच्छेद 200, 201 और 254

राज्यपाल ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 200, 201 और 254 के अंतर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग किया है। इन अनुच्छेदों के अनुसार, यदि कोई राज्य विधेयक संविधान या केंद्रीय कानूनों से टकराता है, तो राज्यपाल उसे राष्ट्रपति की अनुमति हेतु सुरक्षित रख सकते हैं।

यह निर्णय इस ओर संकेत करता है कि यह विधेयक संभावित रूप से राज्य की विधायी सीमा से बाहर जाकर कुछ क्षेत्रों में हस्तक्षेप कर सकता है।

विधेयक की मुख्य विशेषताएं

यह विधेयक धर्म, जाति, नस्ल, लिंग, यौन अभिविन्यास, जन्म स्थान या विकलांगता के आधार पर किसी व्यक्ति या समूह के प्रति घृणा फैलाने वाले भाषण को “हेट स्पीच” के रूप में परिभाषित करता है। इसमें इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री हटाने या ब्लॉक करने की शक्ति राज्य सरकार को दी गई है और सज़ाओं की अवधि एवं जुर्माने में व्यापक वृद्धि प्रस्तावित की गई है।

बढ़ी हुई सजा और संगठनात्मक उत्तरदायित्व

भारतीय न्याय संहिता की धारा 196(1) और 196(2) के अनुरूप, पहली बार अपराध करने पर भी सात वर्ष तक की सजा और ₹50,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। दोहराए गए अपराधों पर यह जुर्माना ₹1 लाख तक बढ़ सकता है।

विधेयक में संगठनों के पदाधिकारियों और नेताओं को जिम्मेदार ठहराने की भी व्यवस्था है, चाहे वे संगठन पंजीकृत हों या नहीं। यह तब लागू होगा जब उनके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में घृणास्पद भाषण या गतिविधियाँ सामने आएं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • राज्यपाल अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्य विधेयक को राष्ट्रपति की अनुमति हेतु सुरक्षित रख सकते हैं।
  • विधेयक घृणा भाषण को कई पहचान आधारित आधारों पर परिभाषित करता है।
  • कई अपराधों को जमानती से गैर-जमानती बना दिया गया है।
  • संगठनात्मक और नेतृत्व स्तर पर जिम्मेदारी तय की गई है।

अस्पष्टता और प्रक्रिया संबंधी आपत्तियाँ

राज्यपाल ने विधेयक में घृणा भाषण की व्यापक और अस्पष्ट परिभाषा को लेकर आपत्ति जताई है, जिससे स्वाभाविक भाषण, अकादमिक विमर्श या वैचारिक आलोचना भी इसके दायरे में आ सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, लोक भवन को इस विधेयक के विरोध में लगभग 40 ज्ञापन प्राप्त हुए हैं, जिनमें इसके दुरुपयोग और मनमानी कार्रवाई की आशंका जताई गई है।

इसके अतिरिक्त, जन परामर्श की कमी, विभागीय विचार-विमर्श का अभाव और विधानसभा में सीमित चर्चा जैसे प्रक्रियात्मक कमज़ोरियों के चलते यह विधेयक अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन कर सकता है तथा केंद्रीय कानूनों से विरोधाभास (repugnancy) की स्थिति उत्पन्न कर सकता है।

यह प्रकरण राज्य और केंद्र के बीच विधायी समन्वय और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक शांति की बहस में एक नया मोड़ ला सकता है।

Originally written on February 1, 2026 and last modified on February 1, 2026.

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