कर्नाटक की अप्पेमिडी आम पर जलवायु परिवर्तन का संकट
कर्नाटक की अघनाशिनी घाटी में पाए जाने वाले स्वदेशी अप्पेमिडी आम, जो अपने अनूठे स्वाद और सांस्कृतिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है, आज जलवायु परिवर्तन के गंभीर खतरे का सामना कर रहा है। वर्ष 2009 में भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग मिलने के बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते वर्षा पैटर्न और बढ़ते तापमान इसके अस्तित्व को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे इसके संरक्षण की आवश्यकता और भी बढ़ गई है।
पदयात्रा से सामने आई गिरती स्थिति
करीब 30 पर्यावरणविदों के एक समूह ने 30 मार्च से 1 अप्रैल के बीच सिद्धापुर तालुक के सराकुली से सिरसी तालुक के उंचल्ली जलप्रपात तक 30 किलोमीटर की पदयात्रा की। इस दौरान किए गए अध्ययन में पाया गया कि अप्पेमिडी आम के पेड़ों की सेहत में गिरावट आ रही है और फल उत्पादन कम हो रहा है। किसानों ने इसके लिए अनियमित मौसम को जिम्मेदार ठहराया। यह भी देखा गया कि जिन क्षेत्रों में मानव हस्तक्षेप कम है, वहां पेड़ों की घनता अपेक्षाकृत अधिक बनी हुई है।
बदलते वर्षा पैटर्न का प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार वर्षा के वितरण में बदलाव इस समस्या का मुख्य कारण है। पहले जहां वर्षा पूरे मौसम में संतुलित रूप से होती थी, वहीं अब कम समय में अत्यधिक वर्षा होने लगी है। इससे मिट्टी में पानी का समुचित अवशोषण नहीं हो पाता, जिससे पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है। इसके साथ ही बढ़ते तापमान ने फूल और फल बनने की प्रक्रिया को भी बाधित किया है।
संरक्षण के लिए इन-सीटू रणनीति की आवश्यकता
पर्यावरणविदों का मानना है कि अप्पेमिडी आम के संरक्षण के लिए इन-सीटू संरक्षण यानी प्राकृतिक आवास में ही संरक्षण सबसे प्रभावी उपाय है। पिछले एक दशक में एक्स-सीटू संरक्षण जैसे ग्राफ्टिंग के प्रयास सीमित सफलता ही दे पाए हैं। अघनाशिनी घाटी की विशिष्ट मिट्टी, जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र इस आम की विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आनुवंशिक विविधता और विरासत पर खतरा
शोधकर्ताओं ने अप्पेमिडी आम की 33 विभिन्न किस्मों की पहचान की है, जिनमें से कई अब खतरे में हैं। कुछ पारंपरिक किस्में पहले ही विलुप्त हो चुकी हैं, जबकि अन्य की उत्पादकता घट रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल व्यावसायिक खेती इस विविधता को बचा नहीं सकती, बल्कि पूरे पारिस्थितिक क्षेत्र का संरक्षण आवश्यक है। इस क्षेत्र को जैव विविधता धरोहर का दर्जा दिलाने के प्रयास भी जारी हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- अप्पेमिडी आम को 2009 में जीआई टैग प्राप्त हुआ था।
- इन-सीटू संरक्षण का अर्थ है प्रजातियों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित करना।
- अघनाशिनी घाटी पश्चिमी घाट के जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है।
- प्रभावी वर्षा वह होती है जो मिट्टी में अच्छे से अवशोषित होकर पौधों की वृद्धि में सहायक हो।
अप्पेमिडी आम केवल एक फल नहीं, बल्कि कर्नाटक की सांस्कृतिक और जैविक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में इसके संरक्षण के लिए ठोस और दीर्घकालिक कदम उठाना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसकी अनूठी पहचान का अनुभव कर सकें।