करगिल युद्ध के नायक ताशी नामग्याल को मरणोपरांत राज्य वीरता सम्मान
लद्दाख प्रशासन ने गणतंत्र दिवस 2025 पर करगिल युद्ध के प्रारंभिक क्षणों में अहम भूमिका निभाने वाले गड़ेरिया ताशी नामग्याल को मरणोपरांत राज्य वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया। यह सम्मान उस साहसी नागरिक को दिया गया जिसकी सतर्कता ने पाकिस्तान के घुसपैठ के षड्यंत्र को समय रहते उजागर कर दिया था। वर्षों बाद मिला यह सम्मान देशभक्ति के उस मौन प्रतीक को श्रद्धांजलि है जिसने देश की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।
इतिहास की दिशा बदलने वाला एक गड़ेरिया
मई 1999 की शुरुआत में ताशी नामग्याल अपने लापता याक्स की तलाश में बटालिक की दुर्गम पहाड़ियों में घूम रहे थे। तभी उन्होंने पठानी कपड़ों में कुछ संदिग्ध लोगों को देखा जो श्रीनगर-लेह राजमार्ग को देख रही ऊंचाइयों पर तैनात थे। ताशी ने बिना समय गंवाए भारतीय सेना को सूचना दी, जिससे पाकिस्तान की घुसपैठ का पहला प्रमाण मिला। इस सतर्कता ने सेना को तत्काल कार्यवाही का अवसर दिया, जिससे दुश्मन की घुसपैठ को विस्तार लेने से पहले ही रोका जा सका।
ऑपरेशन विजय की शुरुआत
ताशी नामग्याल की सूचना ऑपरेशन विजय का आरंभिक अध्याय बनी। मई से जुलाई 1999 के बीच, भारतीय सेना ने घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए भीषण युद्ध लड़ा। इस संघर्ष में 527 भारतीय सैनिकों ने वीरगति प्राप्त की। यह युद्ध लाहौर घोषणा के ठीक बाद हुआ, जिससे पाकिस्तान के विश्वासघात की पोल खुली। ताशी की सतर्कता ने राष्ट्र को भारी क्षति से बचाया और सेना को सटीक प्रतिक्रिया की दिशा दी।
विलंब से मिली पहचान
हालांकि ताशी नामग्याल का योगदान अतुलनीय था, फिर भी उनके जीवनकाल में उन्हें कोई बड़ी मान्यता नहीं मिली। 2018 के एक साक्षात्कार में उन्होंने इस बात का दुख भी जताया था। उनका निधन 2024 में 58 वर्ष की आयु में हुआ। इसके बाद जनवरी 2025 में भारतीय सेना ने बटालिक क्षेत्र में उनका एक स्मारक स्थापित किया, जो अब उनके योगदान का स्थायी प्रतीक बन गया है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- करगिल युद्ध मई-जुलाई 1999 के बीच लड़ा गया।
- ऑपरेशन विजय के अंतर्गत भारत ने घुसपैठियों को वापस खदेड़ा।
- बटालिक सेक्टर लद्दाख में नियंत्रण रेखा के पास स्थित है।
- इस युद्ध में 527 भारतीय सैनिकों ने प्राणों की आहुति दी।
परिवार का गर्व, क्षेत्र की श्रद्धांजलि
ताशी नामग्याल की बेटी डोलकर आर्यन ने यह पुरस्कार परिवार के लिए अत्यंत भावुक क्षण बताया। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने कभी मान-सम्मान की अपेक्षा नहीं की, जबकि वे घुसपैठ की सूचना देने वाले पहले नागरिक थे। यह मरणोपरांत सम्मान लद्दाख की ओर से उस सच्चे देशभक्त को श्रद्धांजलि है जिसने निस्वार्थ साहस से भारत की सीमाओं की रक्षा की।
ताशी नामग्याल की कहानी यह सिखाती है कि सच्ची देशभक्ति केवल सैनिक वर्दी तक सीमित नहीं, बल्कि वह हर उस नागरिक में बसती है जो संकट के समय साहस से काम लेता है।