औद्योगिक संबंध संहिता संशोधन विधेयक 2026 से श्रम कानूनों में नया परिवर्तन
संसद ने औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 को पारित कर श्रम कानूनों के तहत कानूनी स्पष्टता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में ध्वनिमत से पारित इस विधेयक को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। सरकार ने इसे श्रमिक कल्याण और औद्योगिक विकास को मजबूत करने वाला ऐतिहासिक सुधार बताया, जबकि विपक्ष ने इसे श्रमिक-विरोधी और कॉरपोरेट हितों के पक्ष में झुका हुआ करार दिया।
सरकार का पक्ष: श्रमिक संरक्षण और व्यापार सुगमता
श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया ने कहा कि यह संशोधन चारों श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद उत्पन्न अस्पष्टताओं को दूर करने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नई व्यवस्था न्यूनतम वेतन की गारंटी देती है, नियुक्ति पत्र जारी करना अनिवार्य बनाती है और समान कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित करती है, चाहे वह पुरुष हो या महिला।
सरकार का तर्क है कि श्रम सुधारों का उद्देश्य श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए उद्योगों के लिए ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बढ़ावा देना है। मंत्री ने यह भी कहा कि ट्रेड यूनियन और श्रमिक संगठनों का एक बड़ा वर्ग इस ढांचे का समर्थन करता है और सरकार औद्योगिक स्थिरता तथा श्रमिक अधिकारों के संतुलन के लिए प्रतिबद्ध है।
विपक्ष की आपत्तियाँ: रोजगार सुरक्षा पर प्रश्न
विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि श्रम संहिताएँ श्रमिकों के अधिकारों को कमजोर करती हैं और रोजगार सुरक्षा को खतरे में डालती हैं। उनका कहना था कि संशोधन ‘नौकरी से निकालने की आसानी’ को बढ़ावा दे सकता है, जबकि ‘नौकरी देने की आसानी’ के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं हैं।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने 2020 के कानून में पूर्वव्यापी संशोधन को प्रशासनिक विफलता का संकेत बताया। विपक्षी दलों ने यह भी आशंका जताई कि कार्य घंटे बढ़ाने और छंटनी संबंधी नियमों में ढील से श्रमिक सुरक्षा कमजोर हो सकती है।
औद्योगिक संबंध संहिता की पृष्ठभूमि
औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ने तीन प्रमुख श्रम कानूनों—ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926; औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946; और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947—को समाहित किया था। यह व्यापक श्रम सुधार प्रक्रिया का हिस्सा था, जिसके तहत जटिल श्रम कानून ढांचे को चार समेकित संहिताओं में पुनर्गठित किया गया।
ये चार संहिताएँ वेतन, सामाजिक सुरक्षा, व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य, तथा औद्योगिक संबंधों से संबंधित प्रावधानों को एकीकृत करती हैं। इस एकीकरण का उद्देश्य नियमों को सरल बनाना, अनुपालन को सुगम करना और कानूनी विवादों को कम करना है।
उद्योग और श्रमिकों पर संभावित प्रभाव
संशोधन से उद्योगों के लिए अनुपालन प्रक्रियाएँ अधिक स्पष्ट और सुव्यवस्थित होने की उम्मीद है। समर्थकों का मानना है कि एकरूप परिभाषाएँ और सरलीकृत प्रक्रियाएँ मुकदमों को कम करेंगी और निवेश को प्रोत्साहित करेंगी।
हालाँकि आलोचकों का कहना है कि छंटनी और विवाद निपटान में लचीलापन नियोक्ताओं के पक्ष में शक्ति संतुलन को झुका सकता है। यह बहस भारत की अर्थव्यवस्था में श्रमिक कल्याण और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के बीच जारी संतुलन को दर्शाती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
* औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ने तीन प्रमुख श्रम कानूनों को समाहित किया है।
* भारत में चार समेकित श्रम संहिताएँ हैं—वेतन, सामाजिक सुरक्षा, व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य, और औद्योगिक संबंध।
* ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 ब्रिटिश शासन काल में लागू किया गया था।
* भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में श्रम विषय शामिल है।
औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 भारत के श्रम कानून ढांचे में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है। यह सुधार जहाँ औद्योगिक विकास और निवेश को प्रोत्साहित करने का प्रयास है, वहीं श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा को लेकर व्यापक बहस भी जारी है। आने वाले समय में इसके वास्तविक प्रभाव से ही स्पष्ट होगा कि यह संतुलन किस दिशा में झुकता है।