एशिया-प्रशांत में मेटाबॉलिक रोगों का सबसे बड़ा बोझ भारत और चीन पर
हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मेटाबॉलिक रोगों का सबसे अधिक बोझ भारत और चीन पर है। यह विश्लेषण वैश्विक स्तर पर किए गए “ग्लोबल बर्डन ऑफ डिज़ीज, इंजरीज़ एंड रिस्क फैक्टर्स स्टडी” के आंकड़ों पर आधारित है, जिसमें 1990 से 2023 तक की स्थिति का अध्ययन किया गया और 2030 तक के संभावित रुझानों का भी अनुमान लगाया गया है। शोधकर्ताओं ने विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष और मृत्यु दर जैसे प्रमुख संकेतकों के आधार पर क्षेत्र में मेटाबॉलिक रोगों और उनसे जुड़े जोखिम कारकों का विश्लेषण किया।
मेटाबॉलिक रोग क्या होते हैं
मेटाबॉलिक रोग तब उत्पन्न होते हैं जब शरीर भोजन से प्राप्त ऊर्जा को तोड़ने, संग्रहित करने या उपयोग करने की सामान्य प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होती है। ये रोग मुख्यतः असंतुलित आहार, जीवनशैली, आनुवंशिक कारणों और पर्यावरणीय परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं।
अध्ययन में पाँच प्रमुख मेटाबॉलिक स्थितियों और जोखिम कारकों का विश्लेषण किया गया। इनमें टाइप-2 मधुमेह, उच्च सिस्टोलिक रक्तचाप, उच्च बॉडी मास इंडेक्स, उच्च एलडीएल कोलेस्ट्रॉल तथा मेटाबॉलिक डिसफंक्शन से जुड़ा फैटी लिवर रोग शामिल हैं। ये सभी कारक लंबे समय तक रहने वाली बीमारियों और समय से पहले मृत्यु का बड़ा कारण बनते हैं।
भारत में बढ़ता स्वास्थ्य संकट
अध्ययन के अनुसार वर्ष 2023 में भारत में टाइप-2 मधुमेह से जुड़ी लगभग 2.1 करोड़ विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष दर्ज किए गए, जबकि करीब 5.8 लाख लोगों की मृत्यु इससे संबंधित कारणों से हुई।
उच्च सिस्टोलिक रक्तचाप से लगभग 3.8 करोड़ विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष प्रभावित हुए और करीब 15.7 लाख मौतें दर्ज की गईं। इसके अलावा उच्च बॉडी मास इंडेक्स, एलडीएल कोलेस्ट्रॉल और फैटी लिवर रोग जैसी समस्याएँ भी तेजी से बढ़ रही हैं, जो देश के स्वास्थ्य तंत्र के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं।
विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष के आधार पर वर्ष 2023 में भारत ने चीन को पीछे छोड़ते हुए एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मेटाबॉलिक रोगों के सबसे बड़े बोझ वाला देश बनने की स्थिति प्राप्त कर ली।
बढ़ते जोखिम कारक और भविष्य की प्रवृत्तियाँ
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में मेटाबॉलिक रोगों से जुड़े कई जोखिम कारक लगातार बढ़ रहे हैं। विशेष रूप से उच्च बॉडी मास इंडेक्स में प्रतिवर्ष लगभग 2.7 से 2.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की जा रही है।
इसी तरह एलडीएल कोलेस्ट्रॉल और फैटी लिवर रोग के मामलों में भी लगातार वृद्धि देखी जा रही है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है, तो वर्ष 2030 तक एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मेटाबॉलिक रोगों का कुल बोझ और अधिक बढ़ सकता है, जिससे स्वास्थ्य प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- ग्लोबल बर्डन ऑफ डिज़ीज अध्ययन स्वास्थ्य हानि को मापने के लिए विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष जैसे संकेतकों का उपयोग करता है।
- विकलांगता-समायोजित जीवन वर्ष समय से पहले मृत्यु और बीमारी के साथ बिताए गए वर्षों को मिलाकर मापा जाता है।
- टाइप-2 मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापा विश्वभर में गैर-संचारी रोगों के प्रमुख कारण माने जाते हैं।
- मेटाबॉलिक डिसफंक्शन से जुड़ा फैटी लिवर रोग उन स्थितियों को दर्शाता है जिनमें चयापचय संबंधी जोखिम कारकों के कारण यकृत में वसा जमा हो जाती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मेटाबॉलिक रोगों की बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए व्यापक रोकथाम रणनीतियों की आवश्यकता है। इसके लिए संतुलित आहार को बढ़ावा देना, अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों पर नियंत्रण, पैकेट खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट पोषण लेबलिंग तथा चीनी, नमक और अस्वास्थ्यकर वसा की मात्रा को कम करना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। इसके साथ ही शहरी क्षेत्रों में पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए सुरक्षित बुनियादी ढाँचा विकसित करना और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप की नियमित जांच को बढ़ावा देना भी आवश्यक है।