एलएचएस 1903 प्रणाली की अनोखी संरचना ने ग्रह निर्माण सिद्धांतों को चुनौती दी

एलएचएस 1903 प्रणाली की अनोखी संरचना ने ग्रह निर्माण सिद्धांतों को चुनौती दी

एलएचएस 1903, जिसे टीओआई-1730 या जी 107-55 के नाम से भी जाना जाता है, एक छोटा एम-ड्वार्फ तारा है, जो पृथ्वी से लगभग 116.3 प्रकाश-वर्ष दूर लिन्क्स तारामंडल में स्थित है। यह तारा सूर्य की तुलना में ठंडा और कम प्रकाशमान है, किंतु इसके चारों ओर मौजूद ग्रह प्रणाली ने खगोलविदों के स्थापित ग्रह निर्माण सिद्धांतों को चुनौती दी है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के ‘केओप्स’ अंतरिक्ष यान द्वारा किए गए अवलोकनों में इस प्रणाली की असामान्य संरचना उजागर हुई है।

असामान्य ग्रह विन्यास

प्रारंभिक अध्ययन में यह प्रणाली सामान्य प्रतीत हुई। तारे के सबसे निकट एलएचएस 1903बी नामक एक पथरीला ग्रह परिक्रमा करता है। इसके बाद एलएचएस 1903सी और एलएचएस 1903डी नामक दो गैसीय ग्रह स्थित हैं, जो इस पारंपरिक धारणा के अनुरूप हैं कि पथरीले ग्रह तारे के पास बनते हैं और गैस दानव अपेक्षाकृत दूर ठंडे क्षेत्रों में विकसित होते हैं।

हालांकि, वारविक विश्वविद्यालय के खगोलविदों ने, थॉमस विल्सन के नेतृत्व में, प्रणाली के बाहरी छोर पर चौथे ग्रह एलएचएस 1903ई की पहचान की। आश्चर्यजनक रूप से यह भी एक पथरीला ग्रह है, जबकि इस दूरी पर गैसीय ग्रह की अपेक्षा की जाती थी। इस प्रकार ग्रहों की श्रृंखला “पथरीला, गैसीय, गैसीय, और फिर पथरीला” बनती है, जो अत्यंत दुर्लभ है।

ग्रह निर्माण सिद्धांतों पर प्रश्न

वर्तमान मॉडल के अनुसार, तारे के निकट स्थित ग्रह तीव्र विकिरण के कारण अपनी गैसीय परत खो देते हैं और केवल घने पथरीले कोर शेष रहते हैं। दूसरी ओर, दूर स्थित ग्रह ठंडे वातावरण में मोटी गैसीय परत बनाए रखते हुए गैस दानव बन जाते हैं।

एलएचएस 1903ई की खोज इस ढांचे को चुनौती देती है। इतनी दूरी पर एक पथरीला ग्रह यह संकेत देता है कि या तो इसने अपनी वायुमंडलीय परत खो दी, या फिर इसके निर्माण के समय गैस उपलब्ध ही नहीं थी। दोनों ही संभावनाएं प्रोटोप्लानेटरी डिस्क के विकास और गैस वितरण के बारे में मौजूदा धारणाओं को पुनः विचार करने की आवश्यकता दर्शाती हैं।

संभावित परिकल्पनाओं की जांच

शोधकर्ताओं ने कई संभावित परिदृश्यों का परीक्षण किया। एक संभावना यह थी कि किसी बड़े टकराव ने ग्रह के वायुमंडल को नष्ट कर दिया हो। दूसरी परिकल्पना ग्रहों के कक्षीय प्रवास की थी, जिसमें प्रारंभिक विकास के दौरान ग्रहों ने अपनी स्थिति बदली हो सकती है।

हालांकि, सिमुलेशन और कक्षीय गणनाओं ने इन दोनों संभावनाओं को खारिज कर दिया। उपलब्ध साक्ष्य इस ओर संकेत करते हैं कि ग्रहों का निर्माण क्रमिक रूप से हुआ। जब एलएचएस 1903ई का निर्माण हुआ, तब तक प्रोटोप्लानेटरी डिस्क में गैस की मात्रा काफी कम हो चुकी थी, जिससे वह गैसीय आवरण विकसित नहीं कर सका।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • एम-ड्वार्फ तारे सूर्य से छोटे, ठंडे और कम प्रकाशमान होते हैं।
  • ‘केओप्स’ (कैरेक्टराइजिंग एक्सोप्लैनेट सैटेलाइट) यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का मिशन है, जिसे 2019 में प्रक्षेपित किया गया था।
  • प्रोटोप्लानेटरी डिस्क युवा तारों के चारों ओर गैस और धूल का घेरा होती है, जहां ग्रहों का निर्माण होता है।
  • गैस दानव सामान्यतः ‘स्नो लाइन’ से परे बनते हैं, जहां वाष्पशील यौगिक संघनित हो सकते हैं।

यह खोज संकेत देती है कि ग्रह निर्माण गैस-रहित वातावरण में भी संभव हो सकता है। एलएचएस 1903 प्रणाली की अनोखी संरचना खगोल विज्ञान में ग्रह विकास की विविधता को उजागर करती है और यह दर्शाती है कि ब्रह्मांड में ग्रह निर्माण की प्रक्रिया अभी भी पूरी तरह समझी नहीं जा सकी है।

Originally written on February 20, 2026 and last modified on February 20, 2026.

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