एपस्टीन-बार वायरस वैक्सीन और माइक्रोप्लास्टिक पर नई शोध

एपस्टीन-बार वायरस वैक्सीन और माइक्रोप्लास्टिक पर नई शोध

एपस्टीन-बार वायरस (ईबीवी) पर संभावित वैक्सीन के विकास की दिशा में वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। यह वायरस विश्व की लगभग 95 प्रतिशत आबादी में पाया जाता है और संक्रामक मोनोन्यूक्लिओसिस, मल्टीपल स्क्लेरोसिस तथा कुछ प्रकार के कैंसर से जुड़ा है। हाल ही में प्रकाशित शोध में प्रयोगशाला स्तर पर ऐसे मोनोक्लोनल एंटीबॉडी विकसित किए गए हैं, जिन्होंने चूहों के मॉडल में संक्रमण को रोकने में सफलता दिखाई है। इसके साथ ही एक अन्य अध्ययन में प्रोस्टेट कैंसर रोगियों के ऊतकों में माइक्रोप्लास्टिक कणों की उपस्थिति भी दर्ज की गई है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर नई चिंताएं उभरी हैं।

ईबीवी के खिलाफ वैक्सीन की दिशा में प्रगति

वैज्ञानिकों ने मानव एंटीबॉडी जीन वाले चूहों का उपयोग कर 10 मोनोक्लोनल एंटीबॉडी विकसित किए। इन एंटीबॉडी का लक्ष्य वायरस की सतह पर मौजूद दो प्रमुख प्रोटीन—जीपी350 और जीपी42—थे। जीपी350 वायरस को मेजबान कोशिकाओं के रिसेप्टर से जुड़ने में मदद करता है, जबकि जीपी42 कोशिका के भीतर प्रवेश को संभव बनाता है।

शोध में पाया गया कि जीपी42 को लक्ष्य करने वाला एक एंटीबॉडी मानवकृत प्रतिरक्षा प्रणाली वाले चूहों में संक्रमण को पूरी तरह रोकने में सक्षम रहा। वहीं जीपी350 को लक्ष्य करने वाले एंटीबॉडी ने आंशिक सुरक्षा प्रदान की। इन परिणामों से संकेत मिलता है कि यदि वायरस के कोशिका में प्रवेश की प्रक्रिया को अवरुद्ध किया जाए तो संक्रमण की रोकथाम संभव हो सकती है। यह खोज भविष्य में प्रभावी वैक्सीन निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

प्रतिरोपण रोगियों के लिए संभावित लाभ

प्रतिरक्षा-दमित प्रत्यारोपण रोगियों में ईबीवी से संबंधित लिम्फोमा एक गंभीर जटिलता है। वर्तमान में प्रत्यारोपण चिकित्सा में ईबीवी संक्रमण या उसके पुनर्सक्रियण की प्रभावी रोकथाम एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का उपयोग उच्च जोखिम वाले समूहों में संक्रमण को रोकने या नियंत्रित करने के लिए किया जा सकता है। यदि यह रणनीति सफल होती है, तो यह प्रत्यारोपण रोगियों की सुरक्षा और दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों में सुधार ला सकती है।

प्रोस्टेट ऊतकों में माइक्रोप्लास्टिक की उपस्थिति

एक अलग अध्ययन में प्रोस्टेट कैंसर के दस रोगियों के ऊतक नमूनों की जांच की गई, जिनमें से नौ में माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए। ट्यूमर ऊतकों में प्रति ग्राम औसतन 40 माइक्रोग्राम प्लास्टिक कण पाए गए, जबकि आसपास के स्वस्थ ऊतकों में यह मात्रा लगभग 16 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम थी। यह लगभग 2.5 गुना अधिक सांद्रता को दर्शाता है।

हालांकि माइक्रोप्लास्टिक और प्रोस्टेट कैंसर के बीच प्रत्यक्ष संबंध के प्रमाण अभी सीमित हैं, लेकिन यह निष्कर्ष पर्यावरणीय प्रदूषण और मानव स्वास्थ्य के बीच संभावित संबंधों की ओर संकेत करता है। पहले के शोधों में माइक्रोप्लास्टिक को हृदय और तंत्रिका संबंधी समस्याओं से जोड़ा गया है, जिससे यह विषय सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

* एपस्टीन-बार वायरस को मानव हर्पीसवायरस 4 भी कहा जाता है।
* यह वायरस संक्रामक मोनोन्यूक्लिओसिस और कुछ प्रकार के लिम्फोमा से जुड़ा है।
* मोनोक्लोनल एंटीबॉडी प्रयोगशाला में तैयार किए गए विशिष्ट अणु होते हैं, जो किसी विशेष एंटीजन को लक्ष्य करते हैं।
* माइक्रोप्लास्टिक वे प्लास्टिक कण होते हैं जिनका आकार 5 मिलीमीटर से कम होता है।

इन दोनों अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान संक्रमणजनित रोगों और पर्यावरणीय खतरों दोनों पर गंभीरता से काम कर रहा है। जहां ईबीवी के खिलाफ वैक्सीन की दिशा में प्रगति भविष्य में बड़ी राहत दे सकती है, वहीं माइक्रोप्लास्टिक की बढ़ती उपस्थिति मानव स्वास्थ्य के लिए नई चुनौतियां पेश कर रही है। आगे के शोध इन मुद्दों की गहराई को समझने और प्रभावी समाधान विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

Originally written on February 27, 2026 and last modified on February 27, 2026.

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