उत्तराखंड के कॉर्बेट क्षेत्र में दुर्लभ डस्की ईगल आउल की जोड़ी देखी गई

उत्तराखंड के कॉर्बेट क्षेत्र में दुर्लभ डस्की ईगल आउल की जोड़ी देखी गई

उत्तराखंड में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पास स्थित तराई वेस्ट वन प्रभाग के फाटो पर्यटन क्षेत्र में दुर्लभ डस्की ईगल आउल की एक जोड़ी देखे जाने की खबर सामने आई है। इस खोज ने वन्यजीव संरक्षणकर्ताओं और पक्षी प्रेमियों में उत्साह पैदा कर दिया है, क्योंकि इस प्रजाति को इस क्षेत्र में आखिरी बार आधिकारिक रूप से वर्ष 2010 में दर्ज किया गया था। यह नई sighting तराई क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को दर्शाती है और यह भी संकेत देती है कि इस इलाके में प्राकृतिक आवास की स्थिति बेहतर हो रही है।

प्रकृतिविद द्वारा दुर्लभ प्रजाति का दस्तावेजीकरण

डस्की ईगल आउल की इस जोड़ी को प्रकृतिविद हिमांशु तिरुवा ने अपने कैमरे में कैद किया। उनकी खींची गई तस्वीरों ने जल्द ही पक्षी विज्ञानियों और वन्यजीव प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया। यह प्रजाति अपने उत्कृष्ट छलावरण और बेहद गुप्त व्यवहार के लिए जानी जाती है, जिसके कारण इसे देख पाना बहुत मुश्किल होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार घने जंगलों की छतरी में एक दशक से अधिक समय बाद इस उल्लू की मौजूदगी दर्ज होना उत्तराखंड की पक्षी विविधता के लिए एक महत्वपूर्ण रिकॉर्ड माना जा रहा है।

स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि डस्की ईगल आउल जैसे शीर्ष शिकारी पक्षियों की उपस्थिति किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण संकेत होती है। ऐसे शिकारी पक्षी तभी पनपते हैं जब उनके लिए पर्याप्त शिकार उपलब्ध हो और घोंसले बनाने के लिए शांत और सुरक्षित स्थान मौजूद हों।

इस प्रजाति की वापसी यह दर्शाती है कि कॉर्बेट के आसपास का वन क्षेत्र अभी भी छोटे स्तनधारियों और पक्षियों जैसी विविध प्रजातियों को सहारा देने में सक्षम है, जो इस उल्लू के भोजन का प्रमुख हिस्सा हैं।

संरक्षण प्रयासों की भूमिका

वन अधिकारियों के अनुसार इस दुर्लभ प्रजाति की पुनः उपस्थिति क्षेत्र में किए जा रहे लगातार संरक्षण प्रयासों का परिणाम है। तराई वेस्ट वन प्रभाग में बेहतर आवास प्रबंधन, मानव हस्तक्षेप में कमी और प्राकृतिक गलियारों की सुरक्षा जैसे उपाय किए गए हैं।

इन प्रयासों के कारण पुराने पेड़ों वाले जंगल और नदी किनारे की वनस्पति सुरक्षित रह सकी है, जो इस प्रजाति के लिए आदर्श आवास मानी जाती है। एक प्रजनन जोड़ी की मौजूदगी से यह भी संकेत मिलता है कि संरक्षण रणनीतियाँ प्रभावी साबित हो रही हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • डस्की ईगल आउल एक बड़ा शिकारी पक्षी है जिसकी लंबाई लगभग 48 से 58 सेंटीमीटर तक होती है।
  • यह प्रजाति घने जंगलों में विशेष रूप से नदियों और आर्द्रभूमियों के पास पुराने पेड़ों वाले क्षेत्रों में रहना पसंद करती है।
  • हिमालय की तलहटी में स्थित तराई क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव विविधता और महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारों के लिए प्रसिद्ध है।
  • कॉर्बेट टाइगर रिजर्व भारत का सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान है, जिसकी स्थापना वर्ष 1936 में की गई थी।

फाटो पर्यटन क्षेत्र में इस दुर्लभ पक्षी की मौजूदगी से उत्तराखंड में पक्षी अवलोकन पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज पक्षी वैज्ञानिकों, फोटोग्राफरों और प्रकृति प्रेमियों को आकर्षित करेगी। साथ ही शोधकर्ता अब इस क्षेत्र में विस्तृत अध्ययन की योजना बना रहे हैं, जिससे इस प्रजाति के व्यवहार और प्रजनन से जुड़ी नई जानकारी सामने आ सकेगी।

Originally written on March 7, 2026 and last modified on March 7, 2026.

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