ईरान में 1979 की क्रांति के वादे और आज का असंतोष: वैधता के टूटते आधार की कहानी

ईरान में 1979 की क्रांति के वादे और आज का असंतोष: वैधता के टूटते आधार की कहानी

1979 में ईरान की सड़कों पर लाखों लोग एक सरल लेकिन बेहद प्रभावशाली नारे के साथ उतरे थे—“स्वतंत्रता, आज़ादी और सामाजिक न्याय।” यह नारा शाह के शासन के खिलाफ केवल राजनीतिक विद्रोह नहीं था, बल्कि एक नई व्यवस्था के निर्माण का सपना भी था। लगभग पांच दशक बाद, ईरान के भीतर बड़ी आबादी के लिए ये आदर्श अधूरे ही नहीं, बल्कि उलटे पड़ते दिखाई देते हैं। हालिया देशव्यापी विरोध प्रदर्शन, जो तेहरान के ग्रैंड बाज़ार से शुरू होकर कई शहरों और कस्बों तक फैल गए, किसी अचानक विस्फोट की तरह नहीं बल्कि क्रांतिकारी वैधता के धीरे-धीरे बिखरते जाने की प्रक्रिया के रूप में देखे जा रहे हैं।

1979 की क्रांति ने क्या वादा किया था और आगे क्या हुआ

शाह के पतन के बाद जिस इस्लामिक रिपब्लिक का गठन हुआ, उससे अपेक्षा थी कि वह विदेशी प्रभाव से मुक्ति दिलाएगी, नागरिक स्वतंत्रताओं को बहाल करेगी और आर्थिक न्याय का नया ढांचा खड़ा करेगी। लेकिन “स्वतंत्रता” का अर्थ एक प्रकार की निर्भरता से निकलकर दूसरी निर्भरता में बदलता हुआ दिखा। अमेरिका से रिश्ते टूटे, पर चीन और रूस पर बढ़ती आर्थिक-राजनीतिक निर्भरता ने कई ईरानियों के मन में यह भावना पैदा की कि संप्रभुता का दावा व्यवहार में असमान सौदों में बदल गया है।

“आज़ादी” की स्थिति और भी जटिल रही। राजनीतिक असहमति को अपराध माना गया, जीवनशैली पर नियंत्रण बढ़ा और निगरानी निजी जीवन तक फैलती गई। “सामाजिक न्याय” भी भ्रष्टाचार, सत्ता संरचनाओं के संरक्षण और नौकरशाही के दबाव में कमजोर पड़ता गया। इस तरह क्रांति के आदर्श कई लोगों के लिए इतिहास की स्मृति बनकर रह गए।

आर्थिक संकट और राज्य से बढ़ती दूरी

ईरान में आम नागरिक का जीवन लंबे समय से महंगाई, मुद्रा अवमूल्यन, बेरोज़गारी और असुरक्षा के बीच फंसा हुआ है। आधिकारिक बयान अक्सर “प्रतिरोध” और “आत्मनिर्भरता” पर केंद्रित रहते हैं, लेकिन रोज़मर्रा की वास्तविकता घटती क्रयशक्ति और सिकुड़ते अवसरों की ओर इशारा करती है। यही कारण है कि विरोध प्रदर्शन बार-बार लौटते रहे हैं—कभी कीमतों को लेकर, कभी वेतन और ईंधन पर, कभी पानी और अधिकारों पर।

पिछले दो दशकों में विरोध की कई लहरें आईं और हर बार कठोर दमन किया गया, फिर भी असंतोष खत्म नहीं हुआ। इसके उलट, समय के साथ प्रदर्शन अधिक राजनीतिक और सीधे सत्ता को चुनौती देने वाले रूप में सामने आते गए।

ग्रैंड बाज़ार से आंदोलन की शुरुआत का संकेत

इस बार विरोध की सबसे अहम बात यह है कि शुरुआत तेहरान के ग्रैंड बाज़ार से हुई। ऐतिहासिक रूप से यह बाज़ार 1979 की क्रांति का आर्थिक-सामाजिक आधार रहा है और लंबे समय तक इस्लामिक रिपब्लिक का समर्थक स्तंभ माना जाता था। ऐसे में बाज़ार का सक्रिय विरोध में उतरना इस संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि असंतोष केवल युवाओं या सीमित वर्गों तक नहीं रहा, बल्कि उन समूहों तक पहुंच गया है जिन्हें कभी शासन का “स्वाभाविक समर्थक” माना जाता था। इसके बाद आंदोलन का तेजी से फैलना और आर्थिक मांगों से आगे बढ़कर राजनीतिक नारों में बदल जाना शासन के सामाजिक आधार में क्षरण का संकेत देता है।

दमन की राजनीति और सूचना पर नियंत्रण

राज्य की प्रतिक्रिया एक लंबे समय से विकसित “दमन मॉडल” पर आधारित रही है—इंटरनेट बंद करना, संचार ब्लैकआउट, बिजली कटौती और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां। इसका उद्देश्य सूचना का खालीपन बनाकर प्रदर्शनकारियों को अलग-थलग करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंसा की खबरों को धुंधला करना होता है। हालांकि बाहरी मीडिया में मौतों और हिंसा की रिपोर्टें सामने आती हैं, लेकिन ब्लैकआउट के कारण स्वतंत्र सत्यापन कठिन हो जाता है। इसके बावजूद कई इलाकों में विरोध जारी रहना और सुरक्षा बलों से सीधे टकराव की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि भय अब पहले जितना प्रभावी नहीं रहा।

घरेलू संकट के साथ क्षेत्रीय तनाव का केंद्र

ईरान की आंतरिक समस्या केवल घरेलू नहीं रही; उसका प्रभाव क्षेत्रीय राजनीति पर भी पड़ता है। परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइल विकास और विभिन्न प्रॉक्सी समूहों के समर्थन ने उसे मध्य पूर्वी तनावों के केंद्र में ला खड़ा किया है। भीतर सुधार की मांग को अक्सर “विदेशी साजिश” कहकर खारिज किया जाता है, लेकिन आर्थिक संकट झेल रही जनता के बीच यह तर्क धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा है। परिणामस्वरूप यह धारणा मजबूत होती है कि व्यवस्था न केवल नागरिक स्वतंत्रताओं के रास्ते में बाधा है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी चुनौती बन चुकी है।

बाहरी दबाव की भूमिका और उसकी सीमाएं

अमेरिका और अन्य शक्तियों के बयान अक्सर प्रदर्शनकारियों की उम्मीदें बढ़ाते हैं, लेकिन असली प्रश्न यह रहता है कि क्या शब्दों के बाद ठोस कदम उठाए जाएंगे। यदि प्रतिक्रिया केवल प्रतीकात्मक रही, तो शासन को यह संदेश जा सकता है कि दमन की कीमत सीमित है। दूसरी ओर, कठोर हस्तक्षेप या सैन्य विकल्प जोखिम बढ़ा सकते हैं—जिनमें हिंसा बढ़ना और अंदरूनी दमन और तेज होना शामिल है। यह दुविधा एक सच्चाई को उजागर करती है: स्थायी परिवर्तन बाहर से थोपा नहीं जा सकता, लेकिन बाहरी दबाव भीतर शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

विपक्ष की बिखराव और नेतृत्व का संकट

प्रदर्शन आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी नेतृत्व का अभाव और विपक्ष का विभाजन है। राजतंत्र समर्थक समूह रज़ा पहलवी के आसपास अधिक संगठित दिखते हैं, जबकि गणतंत्र समर्थक वर्ग को डर है कि कहीं एक प्रकार की सत्तावादिता दूसरी सत्तावादिता में न बदल जाए। वहीं मीर-हुसैन मौसवी जैसे नेता वर्षों से नजरबंद हैं, जिससे आंदोलन को केंद्रीय नेतृत्व और रणनीतिक समन्वय की कमी महसूस होती है। शासन की दमन क्षमता धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती है, लेकिन यदि आंदोलन संगठित नहीं हुआ तो वह निर्णायक राजनीतिक बदलाव में बदलना कठिन हो सकता है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • 1979 की ईरानी क्रांति का प्रमुख नारा “स्वतंत्रता, आज़ादी और सामाजिक न्याय” था।
  • तेहरान का ग्रैंड बाज़ार ऐतिहासिक रूप से क्रांति और बाद में शासन के लिए आर्थिक-सामाजिक आधार माना जाता रहा है।
  • ईरान में विरोध प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट शटडाउन और संचार ब्लैकआउट दमन की सामान्य रणनीति रही है।
  • ईरान का परमाणु कार्यक्रम और प्रॉक्सी समूहों को समर्थन उसे मध्य पूर्वी भू-राजनीति में प्रमुख भूमिका देता है।

ईरान की दिशा अब कई कारकों पर निर्भर है—विदेशी शक्तियों की प्रतिक्रिया, विपक्ष की एकजुटता, और समाज कितना दमन सहने को तैयार है। साथ ही, सर्वोच्च नेतृत्व की उम्र और भविष्य में सत्ता हस्तांतरण की स्थिति भी निर्णायक साबित हो सकती है। इतना स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में ईरानियों के लिए इस्लामिक रिपब्लिक की नैतिक वैधता कमजोर हो चुकी है। यह असंतोष राजनीतिक बदलाव में बदलेगा या लंबे समय तक अस्थिरता का रूप लेगा—यह आने वाले महीनों में भीतर और बाहर लिए गए निर्णय तय करेंगे।

Originally written on January 16, 2026 and last modified on January 16, 2026.

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