आदित्य पंड्या बने भारत के सबसे युवा एनालॉग अंतरिक्ष यात्री
सत्रह वर्षीय आदित्य पंड्या ने आठ दिन तक चलने वाले एक सिम्युलेटेड लूनर हैबिटेट मिशन को सफलतापूर्वक पूरा कर भारत के सबसे युवा एनालॉग अंतरिक्ष यात्री बनने का गौरव हासिल किया है। यह मिशन गुजरात के कच्छ स्थित धोलेवीरा के श्वेत मरुस्थलीय क्षेत्र में आयोजित किया गया, जहाँ चंद्रमा जैसी भौगोलिक परिस्थितियों का अनुभव कराया गया। इस उपलब्धि ने न केवल भारत के उभरते अंतरिक्ष अनुसंधान प्रयासों को नई दिशा दी है, बल्कि युवाओं की वैज्ञानिक क्षमता को भी रेखांकित किया है।
इंजीनियर और अंतरिक्ष यात्री की दोहरी भूमिका
आदित्य पंड्या की उपलब्धि इसलिए विशेष मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने इस मिशन में दोहरी जिम्मेदारी निभाई। एक ओर वे चार सदस्यीय दल के सक्रिय सदस्य थे, वहीं दूसरी ओर उन्होंने मिशन में प्रयुक्त तकनीकी प्रणालियों का डिजाइन और परीक्षण भी स्वयं किया। लगभग छह महीनों की तैयारी के दौरान उन्होंने हार्डवेयर, बायोमेट्रिक मॉनिटरिंग उपकरण, सुरक्षा सेंसर और इंटरनेट ऑफ थिंग्स आधारित प्रणालियाँ विकसित कीं, जो हैबिटेट को संचालित करने में सहायक रहीं।
कई उपकरणों को त्रि-आयामी प्रिंटिंग तकनीक से तैयार किया गया। इसके अतिरिक्त, हैबिटेट का एक डिजिटल ट्विन मॉडल विकसित किया गया, जिससे मिशन कंट्रोल को वास्तविक समय में प्रदर्शन की निगरानी संभव हुई। विशेषज्ञों के अनुसार, बहुत कम एनालॉग अंतरिक्ष यात्री ऐसे होते हैं जो लाइव सिमुलेशन के दौरान स्वयं द्वारा निर्मित तकनीक का परीक्षण करते हैं।
धोलेवीरा में सिम्युलेटेड चंद्र मिशन
मिशन का आयोजन कच्छ के रण में स्थित धोलेवीरा के सफेद रेगिस्तानी इलाके में किया गया, जिसे चंद्रमा जैसी सतह के कारण चुना गया। दल को कंटेनर-आधारित हैबिटेट में सख्त पृथकता प्रोटोकॉल के तहत रखा गया। सीमित संसाधनों और बाहरी संपर्क के अभाव में उन्हें आठ दिन तक रहना पड़ा।
दैनिक गतिविधियों में वैज्ञानिक प्रयोग, मॉक स्पेसवॉक और सिस्टम की विश्वसनीयता परीक्षण शामिल थे। इसके साथ ही अलगाव की स्थिति में मानव व्यवहार, टीमवर्क और तनाव प्रबंधन का भी अध्ययन किया गया। एनालॉग मिशन भविष्य के ग्रहों पर मानव अभियानों की तैयारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि इनके माध्यम से जीवन-समर्थन तकनीक, आवास संरचना और मानव सहनशक्ति का पूर्व परीक्षण किया जाता है।
शैक्षणिक और उद्यमी पृष्ठभूमि
आदित्य पंड्या ने 10+2 स्तर पर भौतिकी, रसायन विज्ञान और गणित विषयों के साथ अपनी शिक्षा पूरी की। इसके बाद उन्होंने जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में अध्ययन किया, जिसमें डेटा-आधारित निर्णय और नवाचार पर विशेष ध्यान दिया गया। वर्तमान में वे कंप्यूटर इंजीनियरिंग में बीटेक की पढ़ाई भी कर रहे हैं।
वे तकनीकी नवाचार और कौशल-आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आईडेन कार्ड्स और इनोजीन नामक पहलों के सह-संस्थापक भी हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए सहायक तकनीक समाधान विकसित करने तथा खगोल विज्ञान से जुड़ी जन-जागरूकता गतिविधियों में भी योगदान दिया है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
* एनालॉग मिशन पृथ्वी पर अंतरिक्ष जैसी परिस्थितियों का कृत्रिम निर्माण कर परीक्षण करने की प्रक्रिया है।
* धोलेवीरा गुजरात के कच्छ जिले के रण क्षेत्र में स्थित एक ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व का स्थल है।
* इंटरनेट ऑफ थिंग्स तकनीक आपस में जुड़े उपकरणों को वास्तविक समय में डेटा साझा करने में सक्षम बनाती है।
* डिजिटल ट्विन किसी भौतिक प्रणाली की आभासी प्रतिकृति होती है, जिसका उपयोग विश्लेषण और परीक्षण के लिए किया जाता है।
आदित्य पंड्या की यह उपलब्धि भारत के उभरते अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र में युवाओं की बढ़ती भागीदारी का प्रतीक है। इंजीनियरिंग कौशल, नेतृत्व क्षमता और विज्ञान संचार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता यह दर्शाती है कि नई पीढ़ी न केवल अंतरिक्ष अनुसंधान में रुचि ले रही है, बल्कि तकनीकी नवाचार के माध्यम से भविष्य के मिशनों की नींव भी मजबूत कर रही है।