आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में ‘प्राचीन भारतीय ग्रंथ, विज्ञान और प्रौद्योगिकी’ पर राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू

आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में ‘प्राचीन भारतीय ग्रंथ, विज्ञान और प्रौद्योगिकी’ पर राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू

आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में “प्राचीन भारतीय ग्रंथ, विज्ञान और प्रौद्योगिकी” विषय पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। इस सम्मेलन में देशभर से विद्वान, शोधकर्ता और शिक्षाविद एकत्रित हुए हैं, जो शास्त्रीय भारतीय ज्ञान परंपराओं और आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन के बीच संबंधों की पड़ताल कर रहे हैं। कार्यक्रम का उद्देश्य अंतःविषय संवाद को प्रोत्साहित करना तथा पारंपरिक ग्रंथों का समकालीन विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से पुनर्मूल्यांकन करना है। इस सम्मेलन को भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद और अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन का समर्थन प्राप्त है। आयोजन में संस्थान के भारतीय ज्ञान प्रणाली केंद्र तथा मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग की संयुक्त भूमिका है।

उद्घाटन सत्र और सम्मेलन के उद्देश्य

उद्घाटन सत्र संस्थान के गोल्डन जुबली लेक्चर थिएटर में आयोजित किया गया। विभागाध्यक्ष एवं संयोजक ज्ञान प्रकाश ने प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह सम्मेलन प्राचीन भारतीय ग्रंथों को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के परिप्रेक्ष्य में पुनः समझने का प्रयास है।

उन्होंने बताया कि मंच का उद्देश्य संस्कृत ग्रंथों, दर्शन और विज्ञान के इतिहास के विशेषज्ञों को इंजीनियरिंग तथा अनुप्रयुक्त विज्ञान के विद्वानों के साथ संवाद हेतु जोड़ना है। इससे ज्ञान परंपराओं का समग्र और वैज्ञानिक पुनर्पाठ संभव हो सकेगा।

भारतीय ज्ञान परंपरा की वैचारिक आधारशिला

संस्थान के निदेशक प्रो. सुकुमार मिश्रा ने अध्यक्षीय संबोधन में भारतीय ज्ञान परंपराओं की गहन वैचारिक संरचना पर प्रकाश डाला। उन्होंने ज्ञान से विज्ञान और फिर प्रौद्योगिकी तक की यात्रा को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब वैज्ञानिक समझ समाज-आर्थिक परिणामों में परिवर्तित होती है, तब वह प्रौद्योगिकी का रूप लेती है।

उनके अनुसार, प्राचीन भारतीय परंपराओं में दर्शन, वैज्ञानिक तर्क और व्यावहारिक अनुप्रयोग का समन्वित दृष्टिकोण विद्यमान था, जो समग्र बौद्धिक विकास का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

मुख्य वक्तव्य और विमर्श

मुख्य अतिथि के रूप में आईआईटी बॉम्बे के प्रो. सी. डी. सेबास्टियन ने “सांख्य दर्शन और आधुनिक विज्ञान” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने सांख्य दर्शन की अवधारणाओं और समकालीन वैज्ञानिक मॉडलों के बीच समानताओं को रेखांकित किया।

विशिष्ट अतिथि स्वामी कृपामयानंद अवधूत ने भारतीय परंपरा में अध्यात्म और विज्ञान के पूरक संबंधों पर विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन में आध्यात्मिकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समृद्ध करने वाले तत्व हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • आईआईटी (आईएसएम) धनबाद झारखंड में स्थित है।
  • भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करती है।
  • सांख्य भारतीय दर्शन के छह आस्तिक दर्शनों में से एक है।
  • अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन भारत में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देता है।

सम्मेलन 27 फरवरी तक विभिन्न तकनीकी सत्रों और विषयगत चर्चाओं के साथ जारी रहेगा। साथ ही, एक सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया जाएगा, जो बौद्धिक विमर्श और भारत की सभ्यतागत विरासत के समन्वय को दर्शाता है। यह आयोजन पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच सेतु निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।

Originally written on February 27, 2026 and last modified on February 27, 2026.

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