आंध्र प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के लिए ‘प्रोजेक्ट हनुमान’ की शुरुआत

आंध्र प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के लिए ‘प्रोजेक्ट हनुमान’ की शुरुआत

आंध्र प्रदेश सरकार ने बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को नियंत्रित करने और वन्यजीव संरक्षण को मजबूत करने के उद्देश्य से “प्रोजेक्ट हनुमान” शुरू किया है। इस पहल का शुभारंभ राज्य के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने 3 मार्च 2026 को विश्व वन्यजीव दिवस के अवसर पर किया। यह कार्यक्रम गुंटूर जिले के मंगलगिरि स्थित आंध्र प्रदेश स्पेशल पुलिस की 6वीं बटालियन के परेड ग्राउंड में लॉन्च किया गया। “प्रोजेक्ट हनुमान” का पूरा नाम “हीलिंग एंड नर्चरिंग यूनिट्स फॉर मॉनिटरिंग, एड एंड नर्सिंग ऑफ वाइल्डलाइफ” है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य वन्यजीवों के बचाव, उपचार और निगरानी प्रणाली को मजबूत करना तथा जंगल से सटे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

आंध्र प्रदेश में बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष

पिछले कुछ वर्षों में आंध्र प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसका मुख्य कारण वन क्षेत्रों पर दबाव, कृषि विस्तार और जंगली जानवरों का मानव बस्तियों की ओर आना है। वित्तीय वर्ष 2025–26 में राज्य में ऐसे कुल 2107 मामले दर्ज किए गए।

इन घटनाओं से प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए सरकार ने लगभग 4 करोड़ रुपये का मुआवजा प्रदान किया। साथ ही मुआवजा राशि में भी वृद्धि की गई है। अब वन्यजीव हमले में मृत्यु होने पर मिलने वाली सहायता राशि 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दी गई है, जबकि घायल व्यक्तियों के लिए मुआवजा 2 लाख रुपये कर दिया गया है। पशुधन के नुकसान की भरपाई भी बाजार मूल्य के आधार पर की जाएगी।

त्वरित प्रतिक्रिया दल और बचाव अवसंरचना

प्रोजेक्ट हनुमान के तहत वन्यजीव आपात स्थितियों से निपटने के लिए एक विशेष प्रतिक्रिया प्रणाली विकसित की गई है। इसके लिए 100 विशेष वाहनों को तैनात किया जाएगा, जिनमें 93 त्वरित प्रतिक्रिया वाहन और 7 वन्यजीव एम्बुलेंस शामिल हैं।

हर टीम में वन विभाग का रेंज अधिकारी, पशु चिकित्सक, जनजातीय सहायक और प्रशिक्षित सहयोगी कर्मचारी शामिल होंगे। इनका कार्य घायल जानवरों को बचाना, उन्हें तत्काल चिकित्सा सहायता देना और आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करना होगा। इसके अलावा विशाखापट्टनम, राजमहेंद्रवरम, तिरुपति और बिरलुट में चार वन्यजीव बचाव और उपचार केंद्र स्थापित किए गए हैं।

ग्राम स्तर पर स्वयंसेवी दल और हाथी प्रबंधन

स्थानीय स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने गांवों में “वज्र” नामक वन्यजीव रक्षक दल बनाए हैं। इन दलों में प्रशिक्षित स्वयंसेवक शामिल हैं, जो छोटे वन्यजीव प्रवेश या सांपों के बचाव जैसी घटनाओं को संभाल सकते हैं। इससे घबराहट कम होगी और जानवरों को नुकसान से बचाया जा सकेगा।

यह परियोजना चित्तूर, श्रीकाकुलम और पार्वतीपुरम मन्यम जैसे जिलों में बढ़ती हाथियों की समस्या से निपटने पर भी ध्यान देती है। कर्नाटक सरकार के सहयोग से राज्य में चार “कुमकी हाथी” तैनात किए गए हैं, जो जंगली हाथियों के झुंड को नियंत्रित करने में प्रशिक्षित होते हैं। अब तक ऐसे आठ अभियान चलाकर हाथियों की आवाजाही को नियंत्रित किया जा चुका है।

तकनीक आधारित निगरानी प्रणाली

प्रोजेक्ट हनुमान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आधुनिक तकनीक का उपयोग है। इसके तहत कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणाली के माध्यम से जंगलों की सीमाओं के पास जानवरों की गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी। इससे जानवरों के मानव बस्तियों में प्रवेश करने से पहले ही चेतावनी जारी की जा सकेगी।

इसके अलावा वन विभाग ने “हनुमान डिजिटल मोबाइल एप्लिकेशन” भी विकसित किया है, जिससे फील्ड स्टाफ को निगरानी, सूचना साझा करने और त्वरित प्रतिक्रिया देने में मदद मिलेगी। यह परियोजना वन विभाग, पंचायत राज संस्थानों, कृषि, बागवानी, राजस्व और पुलिस विभाग के समन्वय से संचालित की जाएगी।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • विश्व वन्यजीव दिवस हर वर्ष 3 मार्च को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
  • कुमकी हाथी प्रशिक्षित पालतू हाथी होते हैं, जिनका उपयोग जंगली हाथियों के झुंड को नियंत्रित करने में किया जाता है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष का मुख्य कारण आवास क्षेत्र का नुकसान, कृषि विस्तार और वन्यजीव गलियारों का बाधित होना है।
  • भारत के कई राज्यों में वन्यजीव बचाव और संघर्ष प्रबंधन के लिए त्वरित प्रतिक्रिया इकाइयों का उपयोग किया जाता है।

प्रोजेक्ट हनुमान आंध्र प्रदेश में वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आधुनिक तकनीक, सामुदायिक भागीदारी और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र के माध्यम से यह पहल मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और जैव विविधता की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

Originally written on March 5, 2026 and last modified on March 5, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *