आंध्र प्रदेश के कोंडा रेड्डी आदिवासी गांव में आग की घटना: 38 झोपड़ियाँ जलकर राख, संरचनात्मक असुरक्षा फिर उजागर
आंध्र प्रदेश के काकीनाडा जिले के प्रतिपाडु मंडल के सरलंका गांव में कोंडा रेड्डी जनजाति के लोगों की 38 झोपड़ियाँ सोमवार देर रात (13 जनवरी 2026) को आग लगने से जलकर राख हो गईं। यह घटना उस समय हुई जब गांव के अधिकांश निवासी संक्रांति के साप्ताहिक शंडी (स्थानीय हाट) में भाग लेने के लिए बाहर गए हुए थे। सौभाग्यवश किसी मानव या पशु की जान नहीं गई, लेकिन प्रभावित 56 परिवार अपने घर और सारा सामान खो बैठे।
शॉर्ट सर्किट से आग की आशंका
स्थानीय लोगों के अनुसार, आग गांव की विद्युत आपूर्ति में शॉर्ट सर्किट के कारण लगी। चूँकि सभी झोपड़ियाँ एक-दूसरे के काफी नजदीक बनी थीं, इसलिए आग ने बहुत तेजी से फैलते हुए एक के बाद एक कई घरों को अपनी चपेट में ले लिया। सूखी घास और लकड़ी से बनी संरचनाएँ ऐसी घटनाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती हैं।
संचार बाधा से देरी हुई सहायता
गांव में मोबाइल नेटवर्क की अनुपस्थिति के कारण घटना की जानकारी समय पर प्रशासन तक नहीं पहुँच पाई। इस कारण दमकल और राहत कर्मियों की प्रतिक्रिया में देरी हुई, और आग के फैलने को समय रहते रोका नहीं जा सका। यह घटना फिर एक बार इस बात को रेखांकित करती है कि दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में आपातकालीन संचार व्यवस्था की गंभीर कमी है।
जनप्रतिनिधियों का दौरा और राहत कार्य प्रारंभ
काकीनाडा से सांसद सना सतीश और नेता वरुपुला सत्यप्रभा ने सरलंका गांव का दौरा कर पीड़ितों से मुलाकात की और नुकसान का आकलन किया। ग्रामीणों ने बताया कि हाल ही में कटी हुई धान की फसल खेतों में ही पड़ी थी, जिसे घर लाने से पहले ही घर जल गए, जिससे आर्थिक संकट और गहरा गया।
पुलिस और जिला प्रशासन ने राहत और पुनर्वास कार्य शुरू कर दिया है और क्षति का औपचारिक आकलन किया जा रहा है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- कोंडा रेड्डी जनजाति आंध्र प्रदेश की विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) में से एक है।
- काकीनाडा जिला आंध्र प्रदेश के पूर्वी तटीय क्षेत्र में स्थित है।
- संक्रांति दक्षिण भारत का प्रमुख फसल उत्सव है।
- झोपड़ी जैसे घर (thatched houses) अग्निकांड के प्रति अत्यधिक असुरक्षित होते हैं।
आदिवासी सुरक्षा और बुनियादी ढांचे को लेकर चिंताएँ
इस अग्निकांड ने आदिवासी क्षेत्रों में बिजली सुरक्षा, आपातकालीन संचार, और आपदा प्रबंधन की कमियों को उजागर किया है। स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रशासन से मांग की है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचाव के लिए सुरक्षित आवास, मोबाइल नेटवर्क कनेक्टिविटी और तेजी से आपदा प्रतिक्रिया प्रणाली सुनिश्चित की जाए।
यह घटना केवल एक आपदा नहीं, बल्कि उन जनजातीय समुदायों की संरचनात्मक उपेक्षा की ओर संकेत है जो अब भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। राज्य और केंद्र सरकार को इस दिशा में सतत और संवेदनशील हस्तक्षेप करना होगा।