आंध्र प्रदेश की ‘पोंडुरु खादी’ को मिला GI टैग: स्वदेशी हस्तकला को वैश्विक मान्यता
भारत की पारंपरिक खादी शिल्पकला को एक नई पहचान मिली है, जब आंध्र प्रदेश की ‘पोंडुरु खादी’ को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया। यह मान्यता इस दुर्लभ हस्तनिर्मित सूती वस्त्र को नकल और दुरुपयोग से कानूनी संरक्षण देती है तथा इससे जुड़े कारीगरों को वैश्विक स्तर पर बाज़ार तक पहुँच और पहचान दिलाने में मदद मिलेगी।
प्रामाणिकता को संरक्षित करने के लिए GI टैग
GI पंजीकरण का अधिकार ‘खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC)’ को दिया गया है। यह टैग यह प्रमाणित करता है कि पोंडुरु खादी का मूल स्थान आंध्र प्रदेश का श्रीकाकुलम जिला, विशेषकर पोंडुरु गाँव है। स्थानीय रूप से इसे ‘पटनुलु’ के नाम से जाना जाता है। यह टैग पारंपरिक कारीगरों के कौशल और विरासत की रक्षा करता है।
KVIC ने इसे क्षेत्रीय उपलब्धि करार दिया
KVIC के अध्यक्ष मनोज कुमार ने GI टैग को पूरी खादी बिरादरी के लिए गौरव का क्षण बताया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन को मान्यता देते हुए कहा कि ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों ने पारंपरिक खादी उत्पादों को नई पहचान दी है और कारीगरों की आजीविका को पुनर्जीवित किया है।
पोंडुरु खादी की विशिष्टता
पोंडुरु खादी हिल कॉटन, पुनासा कॉटन और रेड कॉटन जैसे स्थानीय कपास से पूरी तरह हाथ से बनाई जाती है। इसकी सफाई, कताई और बुनाई की प्रत्येक प्रक्रिया पारंपरिक रूप से मैन्युअल होती है, जो पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक तकनीकों को संजोती है। इसकी सबसे अनूठी बात यह है कि कपास की सफाई के लिए वलुगा मछली के जबड़े की हड्डी का प्रयोग किया जाता है, जो इस क्षेत्र में ही प्रचलित है। इस खादी का यार्न काउंट 100–120 तक होता है, जो इसकी बारीकी और टिकाऊपन को दर्शाता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- पोंडुरु खादी आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के पोंडुरु गाँव से उत्पन्न होती है।
- इसे स्थानीय भाषा में पटनुलु कहा जाता है।
- GI टैग से इसे कानूनी संरक्षण और प्रामाणिकता का प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ।
- KVIC इस GI टैग का पंजीकृत स्वामी है।
आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व
GI टैग मिलने से पोंडुरु खादी को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में पहचान मिलने की संभावना बढ़ गई है, जिससे कारीगरों की आय में वृद्धि, रोजगार सृजन, और स्थानीय शिल्प के संरक्षण को बल मिलेगा। KVIC ने इसे महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन से भी जोड़ा है, जिसमें खादी आत्मनिर्भरता और नैतिक उत्पादन का प्रतीक बनी थी।
आज पोंडुरु खादी सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत और आत्मनिर्भर भारत के समकालीन प्रतीक के रूप में उभर रही है। GI टैग के साथ यह उत्पाद अब वैश्विक मंच पर अपनी सशक्त पहचान बनाने की ओर अग्रसर है।