अरुणाचल प्रदेश में दो नई मेंढक प्रजातियों की खोज: पूर्वी हिमालय की जैव विविधता को नया आयाम
भारत के हर्पेटोलॉजी (सरीसृप व उभयचर विज्ञान) क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज हुई है। अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी हिमालय क्षेत्र में दो नई मेंढक प्रजातियों की खोज ने इस जैव विविधता हॉटस्पॉट की महत्ता को एक बार फिर रेखांकित किया है।
वैज्ञानिक नेतृत्व और खोज की प्रक्रिया
यह खोज दिल्ली विश्वविद्यालय की अनुसंधान टीम ने प्रोफेसर एस. डी. बिजू (जिन्हें ‘फ्रॉगमैन ऑफ इंडिया’ के रूप में जाना जाता है) के नेतृत्व में की। यह शोध उनके पीएचडी छात्र अकलव्य की परियोजना का हिस्सा था। टीम ने तीन वर्षों तक अरुणाचल प्रदेश के दुर्गम वन क्षेत्रों में गहन सर्वेक्षण कर यह उपलब्धि हासिल की।
सोमन स्लेंडर आर्म फ्रॉग
• इस प्रजाति का नाम “Leptobrachium soman” रखा गया है, जिसे तिवारिगांव (अरुणाचल प्रदेश) में खोजा गया।
• यह नाम केरल के पत्रकार ई. सोमनाथ की स्मृति में रखा गया, जो प्रोफेसर बिजू के घनिष्ठ सहयोगी थे।
• इस मेंढक की लंबाई लगभग 55 मिमी होती है, जिसकी आंखें सिल्वर-ग्रे से हल्के नीले रंग की होती हैं।
• इसका शरीर ग्रे-भूरे रंग का होता है, जिस पर असमान हल्के ग्रे धब्बे पाए जाते हैं।
• यह प्रजाति सदाबहार वनों में पाई जाती है और नर आमतौर पर नदियों व धाराओं के किनारे से आवाज़ लगाते हैं।
मेचुका स्लेंडर आर्म फ्रॉग
• दूसरी प्रजाति का नाम “Leptobrachium mechuka” है, जो मेचुका नामक क्षेत्र में पाई गई।
• इसकी लंबाई लगभग 60 मिमी होती है, और इसका रंग लालिमा मिश्रित गाढ़ा भूरा होता है, साथ ही आंखें चमकीली सफेद होती हैं।
• यह प्रजाति उच्च हिमालयी घासभूमियों और सदाबहार वनों के संगम में पाई जाती है, जो इस क्षेत्र की अनूठी उभयचर विविधता को दर्शाता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
• पूर्वी हिमालय एक वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट है।
• Leptobrachium जीनस Megophryidae परिवार का हिस्सा है।
• नई प्रजातियों का वैज्ञानिक विवरण पीयर-रिव्यूड प्रकाशन और सूक्ष्म शारीरिक विश्लेषण के बाद होता है।
• अरुणाचल प्रदेश, भारत के सबसे जैव विविधता संपन्न लेकिन कम अन्वेषित राज्यों में शामिल है।
संरक्षण और वैज्ञानिक महत्त्व
इन नई प्रजातियों के वैज्ञानिक विवरण PeerJ नामक अमेरिकी शोध-पत्रिका में प्रकाशित किए गए। यह खोज इस बात को उजागर करती है कि भारत के कई क्षेत्रों में अब भी अज्ञात वन्य जीव मौजूद हैं, और उनके दस्तावेजीकरण के लिए लगातार कराए जाने वाले टैक्सोनॉमिक अनुसंधान अत्यंत आवश्यक हैं। इसके साथ ही यह खोज अरुणाचल प्रदेश के वनों की संरक्षणात्मक महत्ता को और भी मजबूती देती है।