अमेरिका से तीन प्राचीन कांस्य मूर्तियाँ भारत लौटेंगी: स्मिथसोनियन संग्रहालय का ऐतिहासिक निर्णय

अमेरिका से तीन प्राचीन कांस्य मूर्तियाँ भारत लौटेंगी: स्मिथसोनियन संग्रहालय का ऐतिहासिक निर्णय

संयुक्त राज्य अमेरिका के स्मिथसोनियन के एशियाई कला राष्ट्रीय संग्रहालय ने भारत को तीन प्राचीन दक्षिण भारतीय कांस्य मूर्तियों को लौटाने की घोषणा की है। यह निर्णय सांस्कृतिक विरासत की पुनर्स्थापना और संग्रहालय नैतिकता के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर उभरते सकारात्मक बदलाव का प्रतीक है। इन मूर्तियों की पहचान और अवैध तरीके से उनके अधिग्रहण की पुष्टि के बाद यह फैसला लिया गया।

पुनर्स्थापन के लिए चिन्हित मूर्तियाँ

भारत को लौटाई जा रही मूर्तियों में शामिल हैं:

  • “शिव नटराज” (10वीं शताब्दी, चोल काल)
  • “सोमास्कंद” (12वीं शताब्दी, चोल युग)
  • “संत सुंदरार और परावै” (16वीं शताब्दी, विजयनगर काल)

ये तीनों मूर्तियाँ दक्षिण भारत की उन्नत कांस्य-निर्माण परंपरा की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं और कभी मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठानों और शोभायात्राओं में उपयोग की जाती थीं।

स्रोत जांच और कानूनी निष्कर्ष

संग्रहालय ने 2023 में दक्षिण एशियाई संग्रह की व्यवस्थित समीक्षा शुरू की, जिसमें स्वामित्व और लेन-देन के दस्तावेजों की गहन जांच की गई। 1956–1959 के बीच ली गई तस्वीरों में इन मूर्तियों को तमिलनाडु के मंदिरों में स्थापित पाया गया था।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने पुष्टि की कि इन मूर्तियों को भारतीय पुरावशेष कानून का उल्लंघन कर देश से बाहर ले जाया गया था।
विशेष रूप से, “शिव नटराज” मूर्ति श्री भवा औषधेश्वर मंदिर से ली गई थी और 2002 में झूठे दस्तावेजों के आधार पर संग्रहालय को बेची गई थी।

दीर्घकालीन ऋण समझौता और नैतिक प्रतिबद्धता

हालाँकि सभी तीन मूर्तियाँ औपचारिक रूप से भारत को लौटाई जाएंगी, लेकिन भारत सरकार ने “शिव नटराज” को दीर्घकालीन ऋण पर संग्रहालय को प्रदर्शनी के लिए रखने की अनुमति दी है। यह मूर्ति अब भी दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया कला प्रदर्शनी का हिस्सा बनी रहेगी, लेकिन इसके अवैध हस्तांतरण और पुनः वापसी की पूरी जानकारी के साथ।
संग्रहालय अधिकारियों ने इसे पारदर्शिता और जागरूकता बढ़ाने वाला कदम बताया है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • चोल कालीन कांस्य मूर्तियाँ उन्नत लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग तकनीक के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • दक्षिण भारत में मंदिर प्रतिमाओं का उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों और जुलूसों में होता था।
  • भारतीय पुरावशेष अधिनियम के अनुसार, सांस्कृतिक विरासत की वस्तुओं को अनधिकृत रूप से देश से बाहर ले जाना कानूनन वर्जित है।
  • स्रोत जांच (Provenance Research) आधुनिक संग्रहालय नैतिकता का एक महत्वपूर्ण आधार है।

भारत–अमेरिका सहयोग और वैश्विक संदेश

भारत और अमेरिका के बीच यह पुनर्स्थापन प्रक्रिया भारतीय दूतावास और अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों के सहयोग से संपन्न की जा रही है। अधिकारियों ने कहा कि अभिलेखीय अनुसंधान और वैश्विक नेटवर्क की मदद से मूर्तियों की वास्तविक पहचान संभव हो सकी।
यह पहल भारत–अमेरिका सांस्कृतिक सहयोग को सुदृढ़ करती है और भविष्य में अन्य अवैध रूप से ले जाए गए कलाकृतियों की वापसी की मिसाल स्थापित करती है।

Originally written on January 30, 2026 and last modified on January 30, 2026.

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