अमिट स्याही पर विवाद: महाराष्ट्र निकाय चुनाव में मतदाता चिह्न पर उठे सवाल
भारत में चुनावों की शुचिता और पारदर्शिता का प्रतीक मतदाता की उंगली पर लगा बैंगनी निशान, यानी अमिट स्याही, इन दिनों एक नए विवाद का केंद्र बन गया है। हाल ही में महाराष्ट्र नगर निगम चुनावों के दौरान विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि यह स्याही आसानी से मिट रही है, जिससे चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी की आशंका बढ़ गई है।
अमिट स्याही क्या है और इसका उपयोग क्यों किया जाता है?
अमिट स्याही एक चुनावी सुरक्षा उपाय है, जिसे वोट डालने के तुरंत बाद मतदाता की उंगली पर लगाया जाता है।
- इसका एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि व्यक्ति दोबारा मतदान न कर सके।
- यह स्याही साधारण धुलाई या रगड़ने से नहीं हटती और कुछ सप्ताह तक निशान बना रहता है।
- यह दोहरे मतदान और मतदाता पहचान में धोखाधड़ी रोकने का एक सरल लेकिन प्रभावी तरीका है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और रासायनिक संरचना
- भारत में 1962 के आम चुनावों से अमिट स्याही का उपयोग शुरू हुआ था, जब चुनाव आयोग ने चुनावी धोखाधड़ी को रोकने के लिए इसका निर्णय लिया।
- इस स्याही में सिल्वर नाइट्रेट नामक रसायन होता है, जो त्वचा और सूर्य प्रकाश के संपर्क में आकर गहरा दाग छोड़ता है।
- यह दाग केवल तब हटता है जब त्वचा की ऊपरी परत धीरे-धीरे छिलती है।
- इसमें एक दृश्य रंजक (डाई) भी मिलाया जाता है, जिससे निशान तुरंत दिखाई दे।
निर्माण और प्रयोग की प्रक्रिया
- इस स्याही का सूत्र 1950 के दशक में नेशनल फिजिकल लैबोरेटरी द्वारा विकसित किया गया था।
- इसका निर्माण केवल मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड (कर्नाटक सरकार की इकाई) द्वारा किया जाता है।
- इसे निर्वाचन आयोग और कानून एवं न्याय मंत्रालय के अनुबंध के तहत बनाया जाता है।
- आमतौर पर यह स्याही बाएं हाथ की तर्जनी उंगली पर, नाखून और क्यूटिकल के बीच लगाई जाती है।
- इसे ब्रश या मार्कर पेन से लगाया जा सकता है, लेकिन सख्त निर्देश है कि इसे वोटिंग के बाद ही लगाया जाए।
UPSC प्रीलिम्स के लिए तथ्य
- भारत में अमिट स्याही का उपयोग 1962 से शुरू हुआ।
- इसमें प्रमुख रसायन सिल्वर नाइट्रेट होता है।
- यह स्याही केवल मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड द्वारा बनाई जाती है।
- सामान्य परिस्थितियों में यह निशान चार सप्ताह तक रह सकता है।
महाराष्ट्र चुनाव विवाद और अधिकारियों की प्रतिक्रिया
- चुनावों के दौरान सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो सामने आए जिनमें स्याही को सैनिटाइज़र या नेल पॉलिश रिमूवर से हटाते हुए दिखाया गया।
- खासकर उन क्षेत्रों में जहां मार्कर पेन से स्याही लगाई गई, वहां यह समस्या अधिक देखने को मिली।
- राज ठाकरे सहित कई विपक्षी नेताओं ने इस पर सवाल उठाए और इसे चुनावी सुरक्षा में ढील के रूप में देखा।
- इसके जवाब में राज्य निर्वाचन आयुक्त दिनेश वाघमारे ने कहा कि
- दोहराव मतदान को रोकने के लिए कई अन्य स्तरों पर सत्यापन की व्यवस्था है।
- साथ ही स्थानीय निकाय चुनावों में 2011 से ही मार्कर पेन के प्रयोग की अनुमति है।
यह विवाद भले ही तकनीकी प्रतीत हो, पर यह चुनावों की पारदर्शिता और मतदाता विश्वास के लिहाज से बेहद संवेदनशील मुद्दा है। भारत जैसे लोकतंत्र में हर सुरक्षा उपाय का प्रभावी और विश्वासजनक होना आवश्यक है ताकि आम मतदाता का भरोसा बना रहे।
Originally written on
January 17, 2026
and last modified on
January 17, 2026.