अतिशीत परमाणु भौतिकी: जब ठंड बन जाती है क्वांटम दुनिया की कुंजी

अतिशीत परमाणु भौतिकी: जब ठंड बन जाती है क्वांटम दुनिया की कुंजी

आम जीवन में “ठंड” का मतलब सर्द हवाएँ या वातानुकूलित कमरे की ठंडी हवा हो सकता है, लेकिन आधुनिक भौतिकी में ठंड का मतलब कहीं अधिक गहरा और चरम होता है। परम शून्य तापमान, यानी −273.15°C, वह स्थिति है जहाँ परमाणुओं की गति लगभग रुक जाती है। आज की विज्ञान तकनीक ने यह संभव बना दिया है कि परमाणुओं को इस तापमान से भी अरबवें हिस्से तक ठंडा किया जा सके, जिससे भौतिकी के एक बिल्कुल नए और चमत्कारिक क्वांटम क्षेत्र में झाँकना संभव हो सका है।

आधुनिक भौतिकी में ठंड का अर्थ

तापमान मूलतः परमाणुओं की गति का माप है। जब कोई वस्तु ठंडी होती है, तो उसके अणु धीमी गति से कंपन करते हैं। लेकिन जब तापमान परम शून्य के निकट पहुँचता है, तब ये अणु अब पारंपरिक कणों की तरह व्यवहार नहीं करते, बल्कि तरंगों की तरह व्यवहार करते हैं।

इस स्थिति को अल्ट्राकोल्ड मैटर कहा जाता है, जहाँ क्वांटम प्रभाव इतने सशक्त हो जाते हैं कि उन्हें सीधे अनुभव किया जा सकता है। इससे वैज्ञानिकों को प्राकृतिक नियमों की अत्यंत सूक्ष्मता से जाँच करने का अवसर मिलता है।

लेज़र कूलिंग और परमाणुओं का नियंत्रण

आप किसी परमाणु को बर्फ की तरह ठंडा नहीं कर सकते। इसके लिए वैज्ञानिकों ने एक अभूतपूर्व तकनीक विकसित की — लेज़र कूलिंग

हालाँकि सामान्यतः लेज़र गर्मी उत्पन्न करता है, परंतु प्रकाश की गति और संवेग (momentum) का उपयोग करते हुए, विशेष रूप से ट्यून की गई लेज़र किरणों के माध्यम से परमाणुओं को धीमा किया जा सकता है।

इस तकनीक ने 1997 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिलाया और वैज्ञानिकों को नियमित रूप से परमाणुओं को एक माइक्रोकेल्विन (यानी परम शून्य से एक मिलियनवाँ डिग्री ऊपर) तक ठंडा करने में सक्षम बनाया।

बोस-आइंस्टीन संघनन: एक नई अवस्था

जब तापमान अत्यंत कम होता है, तब परमाणु मिलकर एक सामूहिक क्वांटम अवस्था में विलीन हो जाते हैं, जिसे बोस-आइंस्टीन कंडेन्सेट (BEC) कहा जाता है। यह परिकल्पना 1920 के दशक में अल्बर्ट आइंस्टीन और एस. एन. बोस द्वारा की गई थी और 1995 में पहली बार प्रयोगात्मक रूप से बनाई गई।

BEC में परमाणु एक “सुपर‑एटम” की तरह व्यवहार करते हैं — बिना घर्षण के बहते हैं, तरंगों की तरह interfere करते हैं और क्वांटम प्रभाव को सीधे दिखाते हैं। यह विज्ञान और तकनीक के लिए क्रांतिकारी खोज रही है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • परम शून्य तापमान −273.15°C होता है, जहाँ परमाणुओं की गति न्यूनतम होती है।
  • लेज़र कूलिंग में फोटॉनों के संवेग का उपयोग कर परमाणुओं की गति को धीमा किया जाता है।
  • बोस–आइंस्टीन कंडेन्सेट एक विशिष्ट अवस्था है जहाँ सभी परमाणु एक ही क्वांटम अवस्था में होते हैं।
  • अल्ट्राकोल्ड तापमान पर क्वांटम प्रभाव स्पष्ट रूप से हावी हो जाते हैं।

अनुप्रयोग और भारत की शोध भागीदारी

अतिशीत परमाणुओं का प्रयोग आज के सबसे संवेदनशील उपकरणों में किया जाता है:

  • परमाणु घड़ियाँ, जो GPS और वैश्विक संचार की नींव हैं।
  • गुरुत्वाकर्षण सेंसर और मैग्नेटिक फील्ड डिटेक्टर
  • क्वांटम कंप्यूटर और क्वांटम सिमुलेटर, जो भविष्य की कम्प्यूटिंग क्रांति ला सकते हैं।

भारत ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की है, विशेषतः TIFR, IISc, IISER पुणे और रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट जैसे संस्थानों के माध्यम से। ये संस्थान क्वांटम प्रौद्योगिकी और उच्च-नैतिक माप प्रणाली में वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को सुदृढ़ बना रहे हैं।

अतः “ठंड” का वैज्ञानिक अर्थ केवल तापमान नहीं, बल्कि एक ऐसा दरवाज़ा है जो हमें प्रकृति के सबसे बुनियादी और अद्भुत नियमों तक पहुँचने का मौका देता है।

Originally written on January 15, 2026 and last modified on January 15, 2026.

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