अघनाशिनी–वेदावती नदी जोड़ परियोजना पर यूनेस्को की चिंता: पर्यावरण संरक्षण पर जोर
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने अघनाशिनी–वेदावती नदी जोड़ परियोजना को लेकर चिंता व्यक्त की है और भारत से विश्व धरोहर संरक्षण मानकों का सख्ती से पालन करने का आग्रह किया है। यह प्रतिक्रिया पर्यावरण कार्यकर्ताओं द्वारा पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इस परियोजना से जुड़े पारिस्थितिक जोखिमों को उजागर करने के बाद आई है।
यूनेस्को की सलाह और संरक्षण मानक
यूनेस्को ने स्पष्ट किया है कि किसी भी प्रकार की अवसंरचना या नदी जोड़ परियोजना को 1972 के विश्व धरोहर सम्मेलन के तहत निर्धारित अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों का पालन करना चाहिए। संगठन ने यह भी कहा कि पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में विकास कार्यों को संतुलित और टिकाऊ तरीके से किया जाना चाहिए, ताकि प्राकृतिक संतुलन बना रहे। सदस्य देशों की जिम्मेदारी है कि वे अपने प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करें।
पर्यावरणविदों की चिंताएं
इस परियोजना का पर्यावरण समूहों द्वारा व्यापक विरोध किया जा रहा है। उनका कहना है कि अघनाशिनी नदी से बड़ी मात्रा में पानी हटाने से पश्चिमी घाट की पारिस्थितिकी पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। यह क्षेत्र जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण केंद्र है, जहां कई दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। इसके अलावा, नदी पर निर्भर हजारों लोगों की आजीविका और जल सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है।
परियोजना का विवरण और विरोध
इस परियोजना के तहत लगभग 35 हजार मिलियन क्यूबिक फीट (tmc ft) पानी को अघनाशिनी नदी से वेदावती नदी में स्थानांतरित करने की योजना है। आलोचकों का मानना है कि यह योजना वैज्ञानिक आधार पर पर्याप्त रूप से उचित नहीं है और इससे प्राकृतिक जल प्रवाह तथा वर्षा आधारित जल उपलब्धता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इस मुद्दे पर स्थानीय समुदायों और संगठनों ने बड़े पैमाने पर विरोध दर्ज कराया है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- पश्चिमी घाट यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है और यह जैव विविधता हॉटस्पॉट है।
- विश्व धरोहर सम्मेलन 1972 में अपनाया गया था।
- नदी जोड़ परियोजनाओं का उद्देश्य जल को एक बेसिन से दूसरे में स्थानांतरित करना है।
- यूनेस्को प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर स्थलों के संरक्षण की निगरानी करता है।
नीति और सतत विकास पर प्रभाव
यह मुद्दा विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती को दर्शाता है। यूनेस्को की प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि भविष्य में ऐसी परियोजनाओं के लिए सख्त पर्यावरणीय मूल्यांकन और टिकाऊ योजना बनाना आवश्यक होगा।
इस प्रकार, अघनाशिनी–वेदावती परियोजना का परिणाम न केवल इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करेगा, बल्कि भारत में भविष्य की जल प्रबंधन और संरक्षण नीतियों को भी दिशा देगा।