अंतिम संस्कार का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा का हिस्सा: दिल्ली उच्च न्यायालय

अंतिम संस्कार का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा का हिस्सा: दिल्ली उच्च न्यायालय

दिल्ली उच्च न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया है कि माता-पिता के अंतिम संस्कार का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त गरिमा के अधिकार का अभिन्न अंग है। न्यायालय ने कहा कि ऐसे मानवीय परिस्थितियों में यांत्रिक रूप से पैरोल से इनकार करना दोषी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। यह निर्णय एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें याचिकाकर्ता ने अपने दिवंगत पिता की “तेहरवीं” में शामिल होने हेतु आपातकालीन पैरोल की मांग की थी।

अनुच्छेद 226 और बीएनएसएस के तहत याचिका

यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 226 तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 के अंतर्गत दायर की गई थी। न्यायमूर्ति रविंदर दुडेजा ने ‘अजमेर सिंह उर्फ पिंका बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य’ मामले में चार सप्ताह की पैरोल प्रदान की।

याचिकाकर्ता को 2018 में भारतीय दंड संहिता की धाराओं 376, 354बी, 506 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ई के तहत दोषी ठहराया गया था। उसे 14 वर्ष की सजा सुनाई गई, जिसमें सभी सजाएं साथ-साथ चल रही हैं। याचिका दायर करते समय वह एक वर्ष नौ माह से अधिक की सजा काट चुका था। जेल अभिलेखों में उसका आचरण संतोषजनक बताया गया और उसने पहले कभी पैरोल या फरलो का लाभ नहीं लिया था।

राज्य का विरोध और नियम 1212

राज्य ने दो माह की पैरोल के अनुरोध का विरोध करते हुए दिल्ली कारागार नियम, 2018 के नियम 1212 का हवाला दिया। इस नियम के अनुसार एक दोषसिद्धि वर्ष में अधिकतम आठ सप्ताह की पैरोल दी जा सकती है, किंतु एक बार में चार सप्ताह से अधिक नहीं। हालांकि राज्य ने पिता की मृत्यु की पुष्टि की और मानवीय आधार पर सीमित अवधि की पैरोल पर विचार की सहमति जताई।

गरिमा का अधिकार और मानवीय न्यायशास्त्र

न्यायालय ने कहा कि पैरोल सुधारात्मक और पुनर्वास संबंधी सिद्धांतों पर आधारित है। पारिवारिक संबंधों को बनाए रखना पुनर्वास प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अंतिम संस्कार करना धार्मिक और नैतिक दायित्व है। सत्यापित मानवीय परिस्थितियों में इसका अवसर न देना अनुच्छेद 21 द्वारा संरक्षित गरिमा के अधिकार का हनन होगा।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ गरिमा के अधिकार की गारंटी देता है।
  • अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट जारी करने की शक्ति देता है।
  • दिल्ली कारागार नियम, 2018 राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पैरोल और फरलो को विनियमित करते हैं।
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का स्थान लिया है।

सशर्त राहत और संतुलन का सिद्धांत

अपराध की गंभीरता और मानवीय आवश्यकता के बीच संतुलन स्थापित करते हुए न्यायालय ने चार सप्ताह की पैरोल सख्त शर्तों के साथ स्वीकृत की। इनमें 20,000 रुपये का निजी मुचलका और जमानतदार, स्थानीय थाना प्रभारी के समक्ष साप्ताहिक उपस्थिति, निर्धारित क्षेत्राधिकार में रहना तथा गवाहों को प्रभावित न करना शामिल है। किसी भी उल्लंघन की स्थिति में पैरोल तत्काल निरस्त की जाएगी।

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि संवैधानिक गरिमा कारावास की दीवारों के भीतर भी सुरक्षित रहती है।

Originally written on February 27, 2026 and last modified on February 27, 2026.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *