अंटार्कटिका में 12,000 किमी दूर से टेली-रोबोटिक अल्ट्रासाउंड: भारत की ऐतिहासिक उपलब्धि
भारत ने टेलीमेडिसिन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए अंटार्कटिका स्थित अपने मैत्री अनुसंधान केंद्र में तैनात एक मरीज का लगभग 12,000 किलोमीटर दूर से रियल-टाइम अल्ट्रासाउंड परीक्षण सफलतापूर्वक किया है। नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने इस प्रक्रिया को संचालित किया। यह उपलब्धि दुनिया के सबसे दुर्गम और प्रतिकूल वातावरण में विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाएँ उपलब्ध कराने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
टेली-रोबोटिक अल्ट्रासाउंड प्रणाली का सफल प्रदर्शन
इस परीक्षण को एक उन्नत टेली-रोबोटिक डायग्नोस्टिक प्रणाली के माध्यम से संभव बनाया गया, जिससे भारत में बैठे विशेषज्ञ अंटार्कटिका में स्थापित अल्ट्रासाउंड उपकरण को दूरस्थ रूप से संचालित कर सके। यह विश्व स्तर पर किसी अंटार्कटिक अनुसंधान स्टेशन में इस प्रकार की तकनीक का पहला ज्ञात उपयोग है।
इस परियोजना को राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र, एम्स, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली तथा तकनीकी स्टार्टअप्स के सहयोग से विकसित किया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस परीक्षण ने यह सिद्ध कर दिया कि अत्यधिक ठंड और सीमित संसाधनों वाले अंटार्कटिक वातावरण में भी निर्बाध रियल-टाइम कनेक्टिविटी और तकनीकी दक्षता संभव है।
अंटार्कटिका में स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियाँ
अंटार्कटिका में स्वास्थ्य सेवा प्रदान करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। वहाँ तैनात वैज्ञानिक और सहयोगी कर्मचारी अत्यधिक ठंड, लंबे एकांतवास और सीमित चिकित्सा सुविधाओं का सामना करते हैं। यद्यपि शोध केंद्रों में प्रशिक्षित चिकित्सक और मूलभूत उपकरण उपलब्ध रहते हैं, लेकिन गंभीर परिस्थितियों—जैसे आंतरिक चोट या जटिल रोग—में सुपर-विशेषज्ञ परामर्श प्राप्त करना कठिन होता है।
नई प्रणाली के माध्यम से विशेषज्ञ डॉक्टर दूर से ही अल्ट्रासाउंड परीक्षण का मार्गदर्शन या संचालन कर सकते हैं। इससे त्वरित और सटीक निदान संभव होगा तथा चिकित्सा निकासी के निर्णय लेने में सहायता मिलेगी। कठोर सर्दियों के दौरान मैत्री स्टेशन पर लगभग 25 से 30 वैज्ञानिक और कर्मचारी तैनात रहते हैं, जिनके लिए यह तकनीक अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
सहयोग, संचालन और भविष्य की संभावनाएँ
राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र ने इस प्रणाली को गोवा से अंटार्कटिका तक पहुँचाने और स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह सफलता भारत की तीन दशकों से अधिक पुरानी ध्रुवीय वैज्ञानिक उपस्थिति के लिए एक नई उपलब्धि है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक केवल ध्रुवीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उच्च पर्वतीय क्षेत्रों, अपतटीय प्लेटफार्मों, आपदा-ग्रस्त क्षेत्रों, द्वीपीय इलाकों और ग्रामीण भारत में भी उपयोगी साबित होगी। कोविड-19 महामारी के दौरान विकसित और उपयोग में लाई गई इस तकनीक का ध्रुवीय परिस्थितियों में अनुकूलन डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार को दर्शाता है।
यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण बिंदु
मैत्री अंटार्कटिका में भारत का दूसरा स्थायी अनुसंधान केंद्र है।
राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है।
कोविड-19 महामारी के दौरान टेलीमेडिसिन का व्यापक विस्तार हुआ।
अंटार्कटिका में कोई स्थायी निवासी नहीं है; वहाँ केवल शोधकर्ता तैनात रहते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
अंटार्कटिका पृथ्वी का सबसे ठंडा, शुष्क और तेज हवाओं वाला महाद्वीप है।
भारत ने अंटार्कटिका में वैज्ञानिक अनुसंधान की शुरुआत 1980 के दशक में की थी।
टेली-रोबोटिक चिकित्सा प्रणाली दूरस्थ क्षेत्रों में विशेषज्ञ सेवाएँ उपलब्ध कराने का प्रभावी माध्यम है।
डिजिटल स्वास्थ्य तकनीकें आपातकालीन चिकित्सा निर्णयों को तेज और सटीक बनाती हैं।
समग्र रूप से यह उपलब्धि न केवल भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता को प्रदर्शित करती है, बल्कि दूरस्थ एवं चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की नई संभावनाएँ भी खोलती है। आने वाले समय में ऐसी तकनीकों के व्यापक उपयोग से देश और दुनिया के सुदूर क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधा सुलभ और सशक्त हो सकेगी।